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Kavi Naman bharat
bhor ki to pratiksha kare raat hai
bhor ki to pratiksha kare raat hai | भोर की तो प्रतीक्षा करे रात है,
- Kavi Naman bharat
भोर
की
तो
प्रतीक्षा
करे
रात
है,
बाद
उसके
नई
इक
मुलाक़ात
है
पास
आना
हमारा
अधूरा
अभी,
दूर
जाना
बहुत
दूर
की
बात
है
- Kavi Naman bharat
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वो
जिसपर
उसकी
रहमत
हो
वो
दौलत
मांगता
है
क्या
मोहब्बत
करने
वाला
दिल
मोहब्बत
मांगते
है
क्या
तुम्हारा
दिल
कहे
जब
भी
उजाला
बन
के
आ
जाना
कभी
उगता
हुआ
सूरज
इज़ाज़त
मांगता
है
क्या
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Ankita Singh
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बुलाया
शाम
को
लेकिन
वहाँ
मैं
सुब्ह
जा
बैठा
सुना
था
देर
से
आना
उसे
अच्छा
नहीं
लगता
Krishnakant Kabk
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जानता
हूँ
कि
हवाएँ
तुझे
बहकाती
हैं
जा
चराग़ों
की
तरह
तू
भी
उजाला
कर
दे
ATUL SINGH
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ईद
के
रोज़
यही
अपनी
दु'आ
है
रब
से
मुल्क
में
अमन
का,
उलफ़त
का
बसेरा
हो
जाए
हर
परेशानी
से
हर
शख़्स
को
मिल
जाए
नजात
इस
सियह
रात
का
बस
जल्द
सवेरा
हो
जाए
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Zaki Azmi
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बाक़ी
सारे
काम
भुलाकर
इश्क़
किया
सुब्ह
से
लेकर
शाम
बराबर
इश्क़
किया
ग़लती
ये
थोड़े
थी
इश्क़
किया
हम
ने
ग़लती
ये
थी
ग़ैर
बिरादर
इश्क़
किया
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Vashu Pandey
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उजाले
अपनी
यादों
के
हमारे
साथ
रहने
दो
न
जाने
किस
गली
में
ज़िंदगी
की
शाम
हो
जाए
Bashir Badr
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सुख़न-फ़हमों
की
बस्ती
में
सुख़न
की
ज़िन्दगी
कम
है
जहाँ
शाइर
ज़ियादा
हैं
वहाँ
पर
शा'इरी
कम
है
मैं
जुगनू
हूँ
उजाले
में
भला
क्या
अहमियत
मेरी
वहाँ
ले
जाइए
मुझको
जहाँ
पर
रौशनी
कम
है
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Balmohan Pandey
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सुब्ह
सवेरे
नंगे
पाँव
घास
पे
चलना
ऐसा
है
जैसे
बाप
का
पहला
बोसा
क़ुर्बत
जैसे
माँओं
की
Hammad Niyazi
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सभी
के
दीप
सुंदर
हैं
हमारे
क्या
तुम्हारे
क्या
उजाला
हर
तरफ़
है
इस
किनारे
उस
किनारे
क्या
Hafeez Banarasi
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दो
दफ़ा
ग़ुस्सा
हुए
वो
एक
ग़लती
पर
मेरी
रात
की
रोटी
सवेरे
काम
में
लाई
गई
Tanoj Dadhich
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विरह
से
विकल
इस
हृदय
की
कराहें
हमारे
अधूरे
मिलन
और
राहें
तड़प
बस
हमें
तो
रही
है
तुम्हारी
तुम्हारे
सिवा
हम
किसे
और
चाहें
मुलाक़ात
तुम
सेे
नहीं
हो
रही
है
मुझे
याद
आती
तुम्हारी
निगाहें
यही
बात
हमको
रुलाती
रही
है
नए
साजना
अब
नई
और
बाहें
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Kavi Naman bharat
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राह
उन
सेे
हमारी
अलग
यूँँ
रही
साथ
चलकर
कभी
हम
मिले
ही
नहीं
Kavi Naman bharat
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बहुत
मेकअप
लगाती
है,
हमें
नखरे
दिखाती
है
कभी
नज़रें
चुराती
है
कभी
हमको
सताती
है
नज़र
उसकी
करे
घाइल
लबों
का
काम
है
मरहम
मुहब्बत
दर्द
देती
है
मगर
जीना
सिखाती
है
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Kavi Naman bharat
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जो
हुए
हैं
सृजित
उनको
ढहना
ही
है,
तीर
की
खोज
में
सबको
बहना
ही
है
पीर
सब
को
यहाँ
होती
जीवन
में
पर,
रोज़
सहना
यहाँ
फिर
भी
रहना
ही
है
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Kavi Naman bharat
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स्वयं
की
खोज
में
जिसने
स्वयं
का
मूल
जाना
है
नुकीले
शूल
को
उसने
यहाँ
पर
फूल
जाना
है
सभी
नदियों
की
चाहत
है
समुंदर
जीत
लेना
पर
समुंदर
से
मिलन
पर
तो
स्वयं
को
भूल
जाना
है
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