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Mohit Subran
kis ko tamannaa fath ki kis ko khyaal ab jeet ka
kis ko tamannaa fath ki kis ko khyaal ab jeet ka | किस को तमन्ना फ़त्ह की किस को ख़याल अब जीत का
- Mohit Subran
किस
को
तमन्ना
फ़त्ह
की
किस
को
ख़याल
अब
जीत
का
मैं
हारने
वाला
हूँ
जो
उस
को
बचा
लूँ
काफ़ी
है
- Mohit Subran
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है
दु'आ
याद
मगर
हर्फ़-ए-दुआ
याद
नहीं
मेरे
नग़्मात
को
अंदाज़-ए-नवा
याद
नहीं
Saghar Siddiqui
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हम
हार
गए
तुम
जीत
गए
हम
ने
खोया
तुम
ने
पाया
इन
छोटी
छोटी
बातों
का
हम
कोई
ख़याल
नहीं
करते
Wali Aasi
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अब
सुलगती
है
हथेली
तो
ख़याल
आता
है
वो
बदन
सिर्फ़
निहारा
भी
तो
जा
सकता
था
Ameer Imam
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कुछ
नज़र
आता
नहीं
उस
के
तसव्वुर
के
सिवा
हसरत-ए-दीदार
ने
आँखों
को
अंधा
कर
दिया
Haidar Ali Aatish
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धोखा
है
इक
फ़रेब
है
मंज़िल
का
हर
ख़याल
सच
पूछिए
तो
सारा
सफ़र
वापसी
का
है
Rajesh Reddy
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तेरा
बनता
था
कि
तू
दुश्मन
हो
अपने
हाथों
से
खिलाया
था
तुझे
तेरी
गाली
से
मुझे
याद
आया
कितने
तानों
से
बचाया
था
तुझे
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Ali Zaryoun
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कभी
तो
कोसते
होंगे
सफ़र
को
कभी
जब
याद
करते
होंगे
घर
को
निकल
पड़ती
हैं
औलादें
कमाने
परिंदे
खोल
ही
लेते
हैं
पर
को
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Siddharth Saaz
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इस
ज़िन्दगी
में
इतनी
फ़राग़त
किसे
नसीब
इतना
न
याद
आ
कि
तुझे
भूल
जाएँ
हम
Ahmad Faraz
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एक
चेहरा
है
जो
आँखों
में
बसा
रहता
है
इक
तसव्वुर
है
जो
तन्हा
नहीं
होने
देता
Javed Naseemi
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भुला
दिया
है
जो
तू
ने
तो
कुछ
मलाल
नहीं
कई
दिनों
से
मुझे
भी
तिरा
ख़याल
नहीं
Navin C. Chaturvedi
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नहीं
रहती
है
पहली
जीत
दिल
को
याद
आख़िर
तक
मगर
वो
हार
पहली
दिल
से
आख़िर
तक
नहीं
जाती
Mohit Subran
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मुख़्तसर
इतनी
रही
अपनी
कहानी
'मोहित'
कि
इधर
पैदा
हुए
और
उधर
मर
भी
गए
Mohit Subran
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कोई
तो
बात
उस
जहाँ
में
है
जो
गया
लौट
के
नहीं
आया
Mohit Subran
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बात
जो
फैली
थी
हू-ब-हू
ही
रही
दर-ब-दर
घर-ब-घर
कू-ब-कू
ही
रही
क़ीमती
शय
है
दिल
फिर
से
देता
किसे
तू
ही
पहले
थी
याँ
बाद
तू
ही
रही
ला
नहीं
पाया
अंजाम
तक
हिज्र
को
वस्ल
की
आरज़ू,
आरज़ू
ही
रही
खो
दिया
जान
कर
पहले
तो
एक
शख़्स
उम्र-भर
उस
की
फिर
जुस्तुजू
ही
रही
साल-दर-साल
से
घर
की
सूरत
वही
हाव-हू
रहती
थी
हाव-हू
ही
रही
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Mohit Subran
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हौले-हौले
गुज़र
रहा
हूँ
मैं
वक़्त
से
पहले
मर
रहा
हूँ
मैं
ज़िन्दगी
बस
बसर
की
हो
जिसने
एक
ऐसा
बशर
रहा
हूँ
मैं
फिर
वो
कोई
भी
शख़्स
क्यूँ
न
सही
हर
किसी
को
अखर
रहा
हूँ
मैं
जाने
क्या
सूझी
है
जो
शिद्दत
से
ख़ुद
को
बर्बाद
कर
रहा
हूँ
हाए
ये
सच
वहाँ
तबाही
रही
आज
तक
भी
जिधर
रहा
हूँ
मैं
न
गिनूँ
इस
जहान
को
फिर
तो
हर
जगह
कार-गर
रहा
हूँ
मैं
आख़िरश
क्या
है
वो
जो
खोया
नहीं
फिर
ये
किस
डर
से
डर
रहा
हूँ
मैं
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Mohit Subran
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