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Mohit Subran
ham bhi ban jaayenge aakhir men fasaana ik din
ham bhi ban jaayenge aakhir men fasaana ik din | हम भी बन जाएँगे आख़िर में फ़साना इक दिन
- Mohit Subran
हम
भी
बन
जाएँगे
आख़िर
में
फ़साना
इक
दिन
तुम
भी
इक
रोज़
हो
जाओगे
कहानी
कोई
- Mohit Subran
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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खटखटाने
की
कोई
ज़हमत
ही
आख़िर
क्यूँ
करे
इसलिए
भी
घर
का
दरवाज़ा
खुला
रखता
हूँ
मैं
Tousief Tabish
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देखो
तो
चश्म-ए-यार
की
जादू-निगाहियाँ
बेहोश
इक
नज़र
में
हुई
अंजुमन
तमाम
Hasrat Mohani
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या'नी
कि
इश्क़
अपना
मुकम्मल
नहीं
हुआ
गर
मैं
तुम्हारे
हिज्र
में
पागल
नहीं
हुआ
वो
शख़्स
सालों
बाद
भी
कितना
हसीन
है
वो
रंग
कैनवस
पे
कभी
डल
नहीं
हुआ
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Kushal Dauneria
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अब
बिछड़ने
पर
समझ
पाते
हैं
हम
इक
दूसरे
को
इम्तिहाँ
के
ख़त्म
हो
जाने
पे
हल
याद
आ
रहा
है
Nishant Singh
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भरे
हुए
जाम
पर
सुराही
का
सर
झुका
तो
बुरा
लगेगा
जिसे
तेरी
आरज़ू
नहीं
तू
उसे
मिला
तो
बुरा
लगेगा
ये
आख़िरी
कंपकंपाता
जुमला
कि
इस
तअ'ल्लुक़
को
ख़त्म
कर
दो
बड़े
जतन
से
कहा
है
उस
ने
नहीं
किया
तो
बुरा
लगेगा
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Zubair Ali Tabish
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शरीफ़
इंसान
आख़िर
क्यूँ
इलेक्शन
हार
जाता
है
किताबों
में
तो
ये
लिक्खा
था
रावन
हार
जाता
है
Munawwar Rana
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वो
आदमी
नहीं
है
मुकम्मल
बयान
है
माथे
पे
उस
के
चोट
का
गहरा
निशान
है
वो
कर
रहे
हैं
इश्क़
पे
संजीदा
गुफ़्तुगू
मैं
क्या
बताऊँ
मेरा
कहीं
और
ध्यान
है
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Dushyant Kumar
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जिस
दिन
तुम्हारे
ख़त
का
मुझे
इंतिज़ार
था
उस
दिन
तमाम
पंछी
कबूतर
लगे
मुझे
Ali Rumi
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इसी
लिए
तो
यहाँ
अब
भी
अजनबी
हूँ
मैं
तमाम
लोग
फ़रिश्ते
हैं
आदमी
हूँ
मैं
Bashir Badr
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मौत
नज़दीक
आ
गई
लेकिन
न
खुला
हम
पे
ज़िन्दगी
क्या
है
Mohit Subran
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मुझे
ग़म
नहीं
दिल
ग़मों
से
भरा
है
मुझे
ये
ख़ुशी
है
ये
ख़ाली
नहीं
है
Mohit Subran
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पलकों
में
रह
गया
है
ये
जो
अटक
के
इक
अश्क
अश्क
ये
आख़िरी
भी
पलकों
से
रुख़्सत
होता
Mohit Subran
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ख़त्म
हो
सकता
है
सब
हिन्दू-मुसलमाँ
होने
में
कुछ
अगर
बच
सकता
है
तो
सिर्फ़
इंसाँ
होने
में
Mohit Subran
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सफ़र
कैसे
कटा
उन
रास्तों
को
कौन
गिनता
है
तुम्हारे
सर
पे
बीते
हादसों
को
कौन
गिनता
है
सभी
रखते
हैं
गिन
के
उँगलियों
पर
कामयाबी
को
उठाई
हैं
जो
तुमने
मुश्किलों
को
कौन
गिनता
है
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Mohit Subran
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