hi
0
Search
Shayari
Writers
Events
Blog
Store
Help
Login
By:
00:00/00:00
Mohit Subran
hai aaya aakhiri din saal ka to zehan men yak-dam
hai aaya aakhiri din saal ka to zehan men yak-dam | है आया आख़िरी दिन साल का तो ज़ेहन में यक-दम
- Mohit Subran
है
आया
आख़िरी
दिन
साल
का
तो
ज़ेहन
में
यक-दम
गुज़रते
साल
की
यादों
का
इक
जंगल
उभरता
है
- Mohit Subran
Download Sher Image
सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
Send
Download Image
22 Likes
कभी
पहले
नहीं
था
जिस
क़दर
मजबूर
हूँ
मैं
आज
नज़र
आऊँ
न
ख़ुद
क्या
तुम
सेे
इतना
दूर
हूँ
मैं
आज
तुम्हारे
ज़ख़्म
को
ख़ाली
नहीं
जाने
दिया
मैंने
तुम्हारी
याद
में
ही
चीख़
के
मशहूर
हूँ
मैं
आज
Read Full
SHIV SAFAR
Send
Download Image
3 Likes
ख़याल
कब
से
छुपा
के
ये
मन
में
रक्खा
है
मिरा
क़रार
तुम्हारे
बदन
में
रक्खा
है
Siraj Faisal Khan
Send
Download Image
27 Likes
ज़रा
देर
बैठे
थे
तन्हाई
में
तिरी
याद
आँखें
दुखाने
लगी
Adil Mansuri
Send
Download Image
32 Likes
याद
उसे
इंतिहाई
करते
हैं
सो
हम
उस
की
बुराई
करते
हैं
Jaun Elia
Send
Download Image
40 Likes
परिन्दे
होते
तो
डाली
पर
लौट
भी
जाते
हमें
न
याद
दिलाओ
कि
शाम
हो
गई
है
Rajesh Reddy
Send
Download Image
45 Likes
क्या
सितम
है
कि
अब
तिरी
सूरत
ग़ौर
करने
पे
याद
आती
है
Jaun Elia
Send
Download Image
50 Likes
अपनी
तन्हाई
मिरे
नाम
पे
आबाद
करे
कौन
होगा
जो
मुझे
उस
की
तरह
याद
करे
Parveen Shakir
Send
Download Image
40 Likes
मुद्दतें
हो
गईं
बिछड़े
हुए
तुम
से
लेकिन
आज
तक
दिल
से
मिरे
याद
तुम्हारी
न
गई
Akhtar Shirani
Send
Download Image
27 Likes
ज़रूरत
सब
कराती
है
मोहब्बत
भी
इबादत
भी
नहीं
तो
कौन
बेमतलब
किसी
को
याद
करता
है
Umesh Maurya
Send
Download Image
16 Likes
Read More
वहाँ
ऊपर
ख़ला
में
कहकशाँ
में
कौन
रहता
है
फ़लक
के
पार
जो
है
उस
जहाँ
में
कौन
रहता
है
टहल
आए
हैं
वैसे
तो
बशर
हम
चाँद
तक
लेकिन
सवाल
अब
भी
वही
है
आसमाँ
में
कौन
रहता
है
Read Full
Mohit Subran
Send
Download Image
1 Like
जहान
भर
के
ग़मों
ने
तो
हाए
बख़्श
दिया
मगर
ये
एक
तिरा
ग़म
निगल
गया
मुझ
को
Mohit Subran
Send
Download Image
0 Likes
मज़हब
का
एंगल
लाते
हैं
दोनों
तबक़े
गर्माते
हैं
हिन्दू-मुस्लिम
लड़वाते
हैं
हिन्दू-मुस्लिम
लड़
जाते
हैं
केवल
दंगे
भड़काते
हैं
रोटी
ही
इस
की
खाते
हैं
रोज़
नया
इक
छोड़
शगूफ़ा
ये
लोगों
को
उलझाते
हैं
लिखते
हैं
इक
क़िस्सा
मिल
के
फिर
सब
चैनल
दोहराते
हैं
बात
नहीं
करते
मुद्दे
पे
बस
मुद्दे
से
भटकाते
हैं
सच्चाई
का
दावा
कर
के
झूठी
ख़बरें
फैलाते
हैं
Read Full
Mohit Subran
Download Image
0 Likes
मिला
जो
दर्द
यहाँ
से
वहाँ
से
सब
मैं
ने
लिखी
ग़ज़ल
उसी
के
सीने
में
उतार
दिया
Mohit Subran
Send
Download Image
0 Likes
वक़्त
ने
छोड़ा
न
इक
हाथ
भी
इन
हाथों
में
ज़िन्दगी
तुझ
को
गुज़ारूँ
तो
गुज़ारूँ
कैसे
Mohit Subran
Send
Download Image
0 Likes
Read More
Akbar Allahabadi
Krishna Bihari Noor
Shariq Kaifi
Mohammad Alvi
Anjum Rehbar
Abhishar Geeta Shukla
Ali Zaryoun
Zehra Nigaah
Amjad Islam Amjad
Asad Bhopali
Get Shayari on your Whatsapp
Nafrat Shayari
Pollution Shayari
Falak Shayari
Sarhad Shayari
Garmi Shayari