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MIR SHAHRYAAR
yaad ke shahar men kho gaya dil mira
yaad ke shahar men kho gaya dil mira | याद के शहर में खो गया दिल मिरा
- MIR SHAHRYAAR
याद
के
शहर
में
खो
गया
दिल
मिरा
तेरी
दहलीज़
पर
सो
गया
दिल
मिरा
शौक़
के
दश्त
में
देखते
देखते
बोझ
सा
हिज्र
का
ढो
गया
दिल
मिरा
दिन
किसी
तौर
इस
ने
गुज़ारा
मगर
रात
जब
आई
तो
रो
गया
दिल
मिरा
कौन
जाने
मुझे
किस
की
हसरत
रही
कौन
जाने
कहाँ
खो
गया
दिल
मिरा
अब
किसी
से
भी
शिकवा
नहीं
कुछ
मगर
अब
ये
किस
बात
पर
रो
गया
दिल
मिरा
और
क़ातिल
अदाएँ
दिखाओ
न
यूँँ
बस
करो
हुस्न
वालो
गया
दिल
मिरा
- MIR SHAHRYAAR
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आम
को
ख़ास
लिख
रहा
हूँ
मैं
झूठा
इतिहास
लिख
रहा
हूँ
मैं
लिख
रहा
हूँ
वुजूद
का
क़िस्सा
यानी
बकवास
लिख
रहा
हूँ
मैं
है
सियाही
से
सारा
काग़ज़
तर
क़िस्सा-ए-यास
लिख
रहा
हूँ
मैं
दिल
के
बेरंग
कैनवस
पर
ही
दर्द
को
आस
लिख
रहा
हूँ
मैं
सच
कहूँ
तेरे
हिज्र
को
जानाँ
एक
बनवास
लिख
रहा
हूँ
मैं
तेरी
यादें
तेरे
जुदाई
के
ग़म
अपनी
मीरास
लिख
रहा
हूँ
मैं
तू
बहुत
दूर
है
मगर
तुझ
को
हर
घड़ी
पास
लिख
रहा
हूँ
मैं
खोटे
काग़ज़
पे
झूठे
आँसुओं
से
झूटे
एहसास
लिख
रहा
हूँ
मैं
आम
के
ज़ुम्रे
में
हैं
बाक़ी
सब
बस
तुझे
ख़ास
लिख
रहा
हूँ
मैं
ज़िंदगी
के
उदास
लम्हों
को
जीने
की
बास
लिख
रहा
हूँ
मैं
ज़न
के
क़िर्तास
पर
मलालों
से
जाँ
का
वस्वास
लिख
रहा
हूँ
मैं
होंठों
को
लिख
रहा
हूँ
इक
सहरा
दरिया
को
प्यास
लिख
रहा
हूँ
मैं
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तुझ
को
पहचानना
ही
मुश्किल
है
ये
तेरा
आईना
नहीं
मैं
हूँ
ये
जो
रहती
है
दिल
में
बेचैनी
कोई
और
सानेहा
नहीं
मैं
हूँ
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आँखों
को
आया
है
यक़ीं
लेकिन
मेरा
दिल
मानता
नहीं
लेकिन
तू
यहाँ
से
चला
गया
तो
क्या
तू
है
फिर
भी
यहीं
कहीं
लेकिन
ज़ख़्म
ताज़ा
हैं
आज
भी
दिल
के
वक़्त
मरहम
सही
नहीं
लेकिन
दिल
हवेली
अभी
सलामत
है
मर
गए
सारे
ही
मक़ीं
लेकिन
खो
दिया
आसमान
ने
मुझ
को
ढूँढती
है
मुझे
ज़मीं
लेकिन
मैं
उसे
सच
में
भूल
भी
चुका
हूँ
उस
को
आता
नहीं
यक़ीं
लेकिन
कोई
मुझ
को
समझ
नहीं
पाया
लोगों
ने
कोशिशें
तो
कीं
लेकिन
पूछता
हूँ
मैं
मिलने
आओगी
कहती
है
जी
वो
हाँ
नहीं
लेकिन
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ख़्वाब
फिर
तू
नए
सफ़र
के
देख
पहले
हालात
अपने
घर
के
देख
इक
नज़र
मुझ
को
आँख
भर
के
देख
अपने
दीवाने
को
तो
मर
के
देख
यह
ज़मीं
वो
ज़मीं
नहीं
है
कि
तू
आसमाँ
से
कभी
उतर
के
देख
आज
उस
ने
भी
ज़ुल्फ़ें
खोली
हैं
आज
तू
भी
ज़रा
सँवर
के
देख
क्या
ख़बर
लौट
आए
अगले
पल
थोड़ा
और
इंतिज़ार
कर
के
देख
कितनी
उजलत
से
चलती
है
दुनिया
बैठ
जा
और
ज़रा
ठहर
के
देख
मैं
वही
हूँ
हाँ
जो
तिरा
था
कभी
तू
ज़रा
मुझ
को
ग़ौर
कर
के
देख
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ज़माने
से
पड़े
सूखे
गुलाब
देखोगी
कोई
किताब
पढ़ोगी
तो
याद
आऊँगा
कभी
मोहब्बतों
की
उलझी
उलझी
राहों
पर
जो
तन्हा
तन्हा
चलोगी
तो
याद
आऊँगा
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