आम को ख़ास लिख रहा हूँ मैं

  - MIR SHAHRYAAR
आमकोख़ासलिखरहाहूँमैं
झूठाइतिहासलिखरहाहूँमैं
लिखरहाहूँवुजूदकाक़िस्सा
यानीबकवासलिखरहाहूँमैं
हैसियाहीसेसाराकाग़ज़तर
क़िस्सा-ए-यासलिखरहाहूँमैं
दिलकेबेरंगकैनवसपरही
दर्दकोआसलिखरहाहूँमैं
सचकहूँतेरेहिज्रकोजानाँ
एकबनवासलिखरहाहूँमैं
तेरीयादेंतेरेजुदाईकेग़म
अपनीमीरासलिखरहाहूँमैं
तूबहुतदूरहैमगरतुझको
हरघड़ीपासलिखरहाहूँमैं
खोटेकाग़ज़पेझूठेआँसुओंसे
झूटेएहसासलिखरहाहूँमैं
आमकेज़ुम्रेमेंहैंबाक़ीसब
बसतुझेख़ासलिखरहाहूँमैं
ज़िंदगीकेउदासलम्होंको
जीनेकीबासलिखरहाहूँमैं
ज़नकेक़िर्तासपरमलालोंसे
जाँकावस्वासलिखरहाहूँमैं
होंठोंकोलिखरहाहूँइकसहरा
दरियाकोप्यासलिखरहाहूँमैं
  - MIR SHAHRYAAR
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