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MIR SHAHRYAAR
Khwaab jannat ke dikhaane wale
ख़्वाब जन्नत के दिखाने वाले
- MIR SHAHRYAAR
ख़्वाब
जन्नत
के
दिखाने
वाले
हम
नहीं
झाँसे
में
आने
वाले
कोई
कश्ती
भी
बनाई
होती
जा-ब-जा
दरिया
बनाने
वाले
जिस्म
से
जान
निकल
जाती
है
मुड़
के
मत
देख
यूँँ
जाने
वाले
जो
था
बे-रंग
कभी
उस
ने
भी
सीखे
हैं
ढंग
ज़माने
वाले
ये
तो
सहरा
है
कोई
तू
ने
क्या
सोचा
था
बस्ती
बसाने
वाले
राएगानी
का
गिला
क्या
मुझ
से
पूछा
था
मुझ
को
बनाने
वाले
किस
से
रूठा
हुआ
है
आज
तू
और
हैं
कहाँ
तेरे
मनाने
वाले
कुछ
सुराग़-ए-रह-ए-मंज़िल
तो
छोड़
आख़िरी
शम्अ
बुझाने
वाले
सोच
ले
पहले
ये
आसाँ
नहीं
है
हाथ
उल्फ़त
का
बढ़ाने
वाले
मुझ
को
मरने
दे
बचाने
से
तो
मर
रहा
हूँ
मैं
बचाने
वाले
पहले
दीवार
खड़ी
ही
क्यूँँ
की
आज
दीवार
गिराने
वाले
जी
नहीं
लगता
नए
मौसमों
में
लौट
आ
दोस्त
पुराने
वाले
जिस
की
क़िस्मत
में
था
तू
उस
से
पूछ
मुझ
को
ऐ
मुफ़्त
में
पाने
वाले
ऐ
ग़ज़ल
सर
उठा
हैं
आज
कहाँ
वो
तिरे
सुनने
सुनाने
वाले
- MIR SHAHRYAAR
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तू
तो
फिर
भी
तू
है
अपनी
ज़ात
पर
शक
है
बात
ये
है
अब
मुझे
हर
बात
पर
शक
है
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मेरे
कमरे
में
बेश्तर
तुम
थे
मैं
नहीं
था
यहाँ
मगर
तुम
थे
सारे
चेहरों
में
सर-ब-सर
तुम
थे
मैं
जहाँ
भी
गया
उधर
तुम
थे
फ़िक्र-ए-मंज़िल
मुझे
सताती
क्यूँँ
राहबर
मेरे
हम
सेफ़र
तुम
थे
वो
परिंदा
फिर
उड़ता
तो
कैसे
उस
परिंदे
के
बाल-ओ-पर
तुम
थे
शहर-ए-दिल
की
उदास
गलियों
में
मेरे
हमराह
दर-ब-दर
तुम
थे
इस
भरे
दश्त
में
शजर
तुम
थे
बे-घरों
का
बस
एक
घर
तुम
थे
मेरे
वहशत
भरे
दिनों
का
शम्स
मेरी
नम
रातों
का
क़मर
तुम
थे
निकलूँ
तो
कैसे
निकलूँ
बाहर
अब
इस
हिसार-ए-अलम
का
दर
तुम
थे
मैं
सभी
हालतों
से
था
ला-इल्म
मेरे
होने
की
तो
ख़बर
तुम
थे
दो
क़दम
साथ
हम
चले
थे
मगर
हम
सेफ़र
मेरे
उम्र
भर
तुम
थे
रौशनी
होने
पर
तो
ये
मैं
हूँ
साथ
मेरे
तो
रात
भर
तुम
थे
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सर-ए-बाम
था
मेरे
ख़्वाबों
का
चाँद
आज
महकते
रहे
सारे
मन
के
दरीचे
बरसते
रहे
यादों
के
गहरे
बादल
खुले
थे
सहर
तक
सुख़न
के
दरीचे
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मुझ
सा
इक
शख़्स
हू-ब-हू
मुझ
में
करता
है
मेरी
जुस्तजू
मुझ
में
ख़ुद
से
भी
दूर
मैं
चला
आया
अब
नहीं
कोई
आरज़ू
मुझ
में
रौशनी
का
निशाँ
भी
बाक़ी
नहीं
फैली
है
रात
कू-ब-कू
मुझ
में
कोई
भी
तो
नहीं
मेरे
अंदर
करता
है
कौन
गुफ़्तगू
मुझ
में
मुझ
में
मेरा
मैं
भी
नहीं
बाक़ी
इस
क़दर
आ
बसा
है
तू
मुझ
में
पड़ी
है
ऐसी
हिज्र
की
सर्दी
जम
गया
है
मिरा
लहू
मुझ
में
तू
अगर
कोई
आरज़ू
ही
है
तेरी
क्यूँँ
कर
हो
आरज़ू
मुझ
में
जिसने
मेरे
यक़ीं
को
मारा
है
बैठा
है
क्यूँँ
वो
क़िबला-रू
मुझ
में
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चुप
रहूँगा
मैं
और
कुछ
नहीं
बोलूँगा
सब
सहूँगा
मैं
और
कुछ
नहीं
बोलूँगा
नीम-जाँ
तेरे
लहजे
की
दहलीज़
पर
मर
रहूँगा
मैं
और
कुछ
नहीं
बोलूँगा
सदियों
से
सूरत-ए-अश्क
था
पलकों
पर
अब
बहूँगा
मैं
और
कुछ
नहीं
बोलूँगा
ज़िंदगी
एक
बे-बस
के
मानिंद
सब
ग़म
सहूँगा
मैं
और
कुछ
नहीं
बोलूँगा
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