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Manoj Devdutt
phir vahii ham gunaah kar rahe hain
phir vahii ham gunaah kar rahe hain | फिर वही हम गुनाह कर रहे हैं
- Manoj Devdutt
फिर
वही
हम
गुनाह
कर
रहे
हैं
ख़ुद
ख़ुदी
को
तबाह
कर
रहे
हैं
- Manoj Devdutt
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ख़ुदी
को
कर
बुलंद
इतना
कि
हर
तक़दीर
से
पहले
ख़ुदा
बंदे
से
ख़ुद
पूछे
बता
तेरी
रज़ा
क्या
है
Allama Iqbal
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गर
अदीबों
को
अना
का
रोग
लग
जाए
तो
फिर
गुल
मोहब्बत
के
अदब
की
शाख़
पर
खिलते
नहीं
Afzal Ali Afzal
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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हाँ
ठीक
है
मैं
अपनी
अना
का
मरीज़
हूँ
आख़िर
मिरे
मिज़ाज
में
क्यूँँ
दख़्ल
दे
कोई
Jaun Elia
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बे-ख़ुदी
बे-सबब
नहीं
'ग़ालिब'
कुछ
तो
है
जिस
की
पर्दा-दारी
है
Mirza Ghalib
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ज़ख़्म
की
इज़्ज़त
करते
हैं
देर
से
पट्टी
खोलेंगे
चेहरा
पढ़ने
वाले
चोर
गठरी
थोड़ी
खोलेंगे
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Khurram Afaq
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होश
वालों
को
ख़बर
क्या
बे-ख़ुदी
क्या
चीज़
है
इश्क़
कीजे
फिर
समझिए
ज़िंदगी
क्या
चीज़
है
Nida Fazli
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निगल
ही
चुका
था
जफ़ा
का
निवाला
अना
फिर
तमाशा
नया
कर
रही
है
Amaan Pathan
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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सुन
ओ
कहानीकार
कोई
ऐसा
रोल
दे
ऐसे
अदा
करूँं
मेरी
इज़्ज़त
बनी
रहे
Afzal Ali Afzal
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पेड़
जो
ये
कटा
हुआ
है
अब
रोया
पंक्षी
ये
क्या
हुआ
है
अब
जो
नहीं
था
बुरा
किसी
का
भी
उसका
ही
क्यूँँ
बुरा
हुआ
है
अब
पहले
मेरी
दवा
हुआ
था
जो
क्यूँँ
मेरी
वो
सज़ा
हुआ
है
अब
मसअले
सब
सुलझ
गए
हैं
अब
कम
ये
फिर
मसअला
हुआ
है
अब
अच्छा
सब
कुछ
तेरा
हुआ
था
बस
सब
बुरा
फिर
मेरा
हुआ
है
अब
ख़ुश
नहीं
है
रक़ीब
से
भी
वो
ये
मुझे
भी
पता
हुआ
है
अब
दुश्मनी
भी
तो
इस
तरह
की
है
बैरी
से
राबता
हुआ
है
अब
बिछड़े
थे
हम
मनोज
पहले
ही
फ़ासला
बस
अदा
हुआ
है
अब
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Manoj Devdutt
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ज़रूरत
जब
लगी
उस्ताद
की
मुझको
किताबों
की
तरफ़
फिर
चल
दिया
था
मैं
Manoj Devdutt
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महबूब
ही
जब
ख़ुद
ख़ुदा
होने
लगे
ये
थी
वजह
फिर
हम
जुदा
होने
लगे
उसने
समुंदर
से
हमें
रक्खा
जुदा
फिर
हम
बिछड़ते
नाख़ुदा
होने
लगे
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Manoj Devdutt
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अब
यहाँ
कोई
भी
क़द्र-दाँ
है
नहीं
देखते
पहले
सब
ज़ात
और
धर्म
हैं
Manoj Devdutt
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मुझको
उर्दू
आती
नहीं
मैं
क़लमा
कैसे
पढ़ता
बस
फिर
मैंने
उसको
भगवत
गीता
पढ़वा
दी
थी
Manoj Devdutt
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