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Manoj Devdutt
yuñ ghazal ko ab bahar hai zaroori
yuñ ghazal ko ab bahar hai zaroori | यूँँ ग़ज़ल को अब बहर है ज़रूरी
- Manoj Devdutt
यूँँ
ग़ज़ल
को
अब
बहर
है
ज़रूरी
गाँव
को
जैसे
शहर
है
ज़रूरी
खेत
बंजर
ही
हो
गए
सभी
के
खेत
को
अब
तो
नहर
है
ज़रूरी
दाम
कब
मिलते
हैं
किसान
को
अब
बचने
को
अब
फिर
ज़हर
है
ज़रूरी
- Manoj Devdutt
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जि
यूँँगी
किस
तरह
तेरे
बिना
मत
फिक्र
कर
इसकी
गुज़रती
जिस
शहरस
हूँ
दिवाने
छोड़
आती
हूँ
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Parul Singh "Noor"
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बंदा
किसी
के
साथ,
ख़ुदा
हो
किसी
के
साथ
जाने
पराए
शहर
में
क्या
हो
किसी
के
साथ
Mueed Mirza
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ये
मयकशों
का
तवाज़ुन
भी
क्या
तवाज़ुन
है
खड़े
भी
रहना
सहूलत
से
लड़खड़ाना
भी
हमारे
शहर
के
लोगों
को
ख़ूब
आता
है
किसी
को
सर
पे
बिठाना
भी
और
गिराना
भी
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Imran Aami
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और
क्या
चाहती
है
गर्दिश-ए-अय्याम
कि
हम
अपना
घर
भूल
गए
उन
की
गली
भूल
गए
Jaun Elia
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सुना
है
लोग
उसे
आँख
भर
के
देखते
हैं
सो
उस
के
शहर
में
कुछ
दिन
ठहर
के
देखते
हैं
Ahmad Faraz
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घर
पहुँचता
है
कोई
और
हमारे
जैसा
हम
तेरे
शहरस
जाते
हुए
मर
जाते
हैं
Abbas Tabish
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लकीरें
खींच
के
मिट्टी
पे
बैठ
जाता
हूँ
यहाँ
मकाँ
था,
ये
बाज़ार,
ये
गली
उस
की
Ashraf Yousafi
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उसको
शहर
की
सड़कें
अच्छी
लगती
हैं
मेरा
क्या
है
मुझको
चलना
पड़ता
है
Kafeel Rana
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मुझ
को
कहानियाँ
न
सुना
शहर
को
बचा
बातों
से
मेरा
दिल
न
लुभा
शहर
को
बचा
Taimur Hasan
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ये
सोच
कर
के
वो
खिड़की
से
झाँक
ले
शायद
गली
में
खेलते
बच्चे
लड़ा
दिए
मैंने
Unknown
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शर्म
अब
तो
मर
गई
है
हमारी
इश्क़
में
जब
से
पड़े
हैं
तुम्हारे
Manoj Devdutt
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हद
दर्द
की
सब
पार
होने
लगी
माँ
जब
कभी
बीमार
होने
लगी
मुझपर
हुकूमत
तो
किसी
की
नहीं
पर
माँ
मेरी
सरकार
होने
लगी
मुझ
सेे
भले
सब
छीन
ले
ओ
ख़ुदा
बस
माँ
मेरी
दरकार
होने
लगी
अब
अर्थ
माँ
का
ही
मोहब्बत
बना
माँ
मेरा
पहला
प्यार
होने
लगी
चारागरी
मुझपर
हुई
फ़ेल
जब
फिर
माँ
दवा
हरबार
होने
लगी
हर
बार
मुझको
माँ
सुकूँ
देती
रही
बस
माँ
मेरा
इतवार
होने
लगी
जब
मुश्किलों
में
फँस
गया
था
'मनोज'
माँ
मेरी
फिर
पतवार
होने
लगी
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Manoj Devdutt
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एक
दिन
मैं
क्या
ज़रा
सा
रोया
तब
उदासी
हँस
रही
थी
मुझपर
Manoj Devdutt
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तुम
ख़ुश
हो
तो
ख़ुश
रहना
सीखो
जो
कहना
है
वो
कहना
सीखो
धारा
के
साथी
सब
होते
हैं
तुम
धारा
से
अलग
बहना
सीखो
अजल
से
सहती
आई
है
औरत
अब
तुम
बिल्कुल
मत
सहना
सीखो
औरत
दुनिया
का
गहना
है,
तो
कहना
गहने
को
गहना
सीखो
बस
हसरत
मंजिल
की
रखना
अब
मुश्किल
में
मत
तुम
ढहना
सीखो
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Manoj Devdutt
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दूरी
मुझ
सेे
बढ़ा
रही
है
वो
दिल
कहीं
और
लगा
रही
है
वो
बात
करने
की
कह
के
सो
गई
वो
रात
भर
यूँँ
जगा
रही
है
वो
प्यार
पहली
दफ़ा
हुआ
मुझको
ये
किसे
अब
बता
रही
है
वो
आसमाँ
पर
बिठाया
था
उसने
अब
ज़मीं
में
दबा
रही
है
वो
आसमाँ
में
धुआँ
उठा
काला
ख़त
मेरे
सब
जला
रही
है
वो
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Manoj Devdutt
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