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Manoj Devdutt
pyaar ke jab gul khilenge
pyaar ke jab gul khilenge | प्यार के जब गुल खिलेंगे
- Manoj Devdutt
प्यार
के
जब
गुल
खिलेंगे
दाग़
दामन
में
मिलेंगे
रूह
के
चिथड़े
करे
वो
फिर
न
उनको
हम
सिलेंगे
पैर
अंगद
के
हुए
हम
उसके
दर
से
कब
हिलेंगे
- Manoj Devdutt
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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कुछ
न
था
मेरे
पास
खोने
को
तुम
मिले
हो
तो
डर
गया
हूँ
मैं
Nomaan Shauque
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बच्चों
तुम्हीं
बताओ
कि
मईया
कहाँ
गई
रस्ते
में
छोड़कर
ये
सुरईया
कहाँ
गई
इन
रक्षकों
के
ख़ौफ़
से
घर
में
छुपा
हूँ
मैं
पूछेंगे
ये
ज़रूर
कि
गईया
कहाँ
गई
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Paplu Lucknawi
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किसे
है
वक़्त
मोहब्बत
में
दर-ब-दर
भटके
मैं
उसके
शहर
गया
था
किसी
ज़रूरत
से
Riyaz Tariq
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शग़्ल
था
दश्त-नवर्दी
का
कभी
ऐ
'ताबाँ'
अब
गुलिस्ताँ
में
भी
जाते
हुए
डर
लगता
है
Anwar Taban
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मुसाफ़िरों
के
दिमाग़ों
में
डर
ज़ियादा
है
न
जाने
वक़्त
है
कम
या
सफ़र
ज़ियादा
है
Hashim Raza Jalalpuri
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आँख
की
बेबसी
दिल
का
डर
देखना
तुम
किसी
दिन
ग़रीबों
का
घर
देखना
Alankrat Srivastava
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रुके
रुके
से
क़दम
रुक
के
बार
बार
चले
क़रार
दे
के
तिरे
दर
से
बे-क़रार
चले
Gulzar
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उसे
ज़ियादा
ज़रूरत
थी
घर
बसाने
की
वो
आ
के
मेरे
दर-ओ-बाम
ले
गया
मुझ
से
Farhat Abbas Shah
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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अहम
जितनी
सुहागन
के
लिए
माथे
की
बिन्दी
है
ज़रूरी
उतनी
हिन्दुस्तान
के
ख़ातिर
ही
हिन्दी
है
Manoj Devdutt
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उसूल
अब
मोहब्बत
के
बदल
गए
सभी
गुनाह
बे-वफ़ाई
अब
नहीं
रही
यहाँ
Manoj Devdutt
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ख़ुद
को
तो
सब
सही
दिखाते
हैं
आइने
को
सभी
सताते
हैं
बाप
परवाह
करते
हैं
सबकी
बाप
परवाह
कब
जताते
हैं
पेज
तो
अब
बदल
रहे
हैं
पर
चित्र
हम
एक
ही
बनाते
हैं
एक
लड़की
हुई
नहीं
मेरी
फिर
कहाँ
ख़ुद
को
हम
सजाते
हैं
हमने
जिनको
दिखाई
थी
दुनिया
आँख
हमको
वही
दिखाते
हैं
आग
जिनको
बुझानी
थी
प्यारे
आग
अब
बस
वही
लगाते
हैं
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Manoj Devdutt
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सूखे
शजरों
की
कहानी
सुनो
ख़ुद
उन्हीं
की
ही
जुबानी
सुनो
हम
सुख़न-वर
अब
बहुत
कम
कहें
जब
कहें
तो
तुम
रवानी
सुनो
नदियों
की
ही
ये
कहानी
कहे
तुम
कभी
जो
बहता
पानी
सुनो
जब
शिकायत
माँ
की
बेटे
ने
की
कुछ
हमारी
भी
तो
नानी
सुनो
ठीक
अब
इतना
गुरुर
है
नहीं
इस
जहाँ
में
सब
है
फ़ानी
सुनो
अब
तुम्हारे
पास
होंगे
कई
पर
नहीं
है
मेरा
सानी
सुनो
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Manoj Devdutt
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अब
इतना
भी
ज़्यादा
कोई
रोता
है
क्या
ख़ुद
से
ज़्यादा
अपना
कोई
होता
है
क्या
मेरी
पलकों
पर
नींद
की
उधारी
है
अब
आशिक़
हिज्र-ज़दा
फिर
कोई
सोता
है
क्या
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Manoj Devdutt
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