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Manish jain
roz apni bebaasi ka ek manzar le utha hoon
roz apni bebaasi ka ek manzar le utha hoon | रोज़ अपनी बेबसी का एक मंज़र ले उठा हूँ
- Manish jain
रोज़
अपनी
बेबसी
का
एक
मंज़र
ले
उठा
हूँ
होता
है
मौजूद
हर
इक
शख़्स,
बस
तेरे
अलावा
- Manish jain
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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जैसा
मूड
हो
वैसा
मंज़र
होता
है
मौसम
तो
इंसान
के
अंदर
होता
है
Aziz Ejaaz
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रोज़
बस्ते
हैं
कई
शहर
नए
रोज़
धरती
में
समा
जाते
हैं
Kaifi Azmi
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कैसे
मंज़र
सामने
आने
लगे
हैं
गाते
गाते
लोग
चिल्लाने
लगे
हैं
Dushyant Kumar
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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जिस
शाने
पर
सर
रखते
हो
उस
शाने
पर
सो
जाते
हो
जाने
कैसे
दीदावर
हो
हर
मंज़र
में
खो
जाते
हो
Poonam Yadav
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तेरी
आँखों
में
सारे
मनज़र
हैं
हम
कहाँ
हैं,
कहाँ
थे,
कब
होंगे
Meem Alif Shaz
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ग़ज़ल
बनकर
मेरे
दिल
में
समा
जा
मैं
तुझको
गुनगुनाना
चाहता
हूँ
D Faiz Khan
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वो
आँखें
बुझ
चुकी
होंगी
नज़ारा
हो
चुका
होगा
'अली'
वो
शख़्स
अब
दुनिया
को
प्यारा
हो
चुका
होगा
Ali Zaryoun
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मंज़र
बना
हुआ
हूँ
नज़ारे
के
साथ
मैं
कितनी
नज़र
मिलाऊँ
सितारे
के
साथ
मैं
दरिया
से
एक
घूँट
उठाने
के
वास्ते
भागा
हूँ
कितनी
दूर
किनारे
के
साथ
मैं
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Khalid Sajjad
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ग़म
परेशानी,
मोहब्बत,
और
तमन्ना
छोड़
दें
सब
ज़िंदगी
तू
ये
बता
और
कितने
दिन
बाक़ी
हैं
मेरे
Manish jain
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मुकर्रर
नहीं
अश्क-बारी
का
मौसम
यहाँ
दिल
बिखरते
ही
हो
जाती
बरसात
Manish jain
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ये
मेरे
साथ
क्या
हो
गया
यार
मेरा
ख़फ़ा
हो
गया
तूफ़ा
जो
है
उठा
ज़ीस्त
में
उस
का
मैं
ना-ख़ुदा
हो
गया
खो
गया
चाँद
मेरा
कहीं
अब
तो
मैं
रत-जगा
हो
गया
देख
मुझको
पलट
तू
गया
क्या
तेरा
फ़ैसला
हो
गया
मैंने
लिख
दी
ग़ज़ल
तुझ
पे
तो
शहर
में
तब्सिरा
हो
गया
मैं
बिछड़
कर
हूँ
रोया
बहुत
अब
तो
ये
सिलसिला
हो
गया
दर्द
क्या
लगता
है
तेरा
मन
ये
तेरा
आइना
हो
गया
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Manish jain
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किसी
को
अब
ये
नफ़रत
तोड़
देती
है
किसी
को
अब
ये
सोहबत
तोड़
देती
है
भला
पत्थर
से
कब
दिल
टूटते
देखें
दिलों
को
तो
मोहब्बत
तोड़
देती
है
ज़मीं
से
दूर
हो
कर
क्यूँ
बिखरते
पेड़
इन्हें
भी
क्या
ये
फुर्क़त
तोड़
देती
है
जहाँ
ये
झूठों
के
बस
मेंही
तो
है
"मन"
यहाँ
सच
को
सदाक़त
तोड़
देती
है
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Manish jain
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ज़िन्दगी
बस
इसी
इक
सोच
में
कटती
है
अब
फ़िक्र
कैसे
कोई,
मुझ
सी
तेरी
कर
पाएगा
Manish jain
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