zabaan par aablaa ik ba-khuda hai | ज़बाँ पर आबला इक बा-ख़ुदा है

  - Lalit Mohan Joshi
ज़बाँपरआबलाइकबा-ख़ुदाहै
वहीहरसाँसकोथा
मेंहुआहै
मैंरिश्तोंकोनिभाताहीरहाहूँ
मुझेहररोज़लेकिनग़ममिलाहै
मिराइसशहरमेंअबजीनहींहै
मगरघरकेलिएघरछोड़नाहै
टंगापंखेपेहोतावोकिसीदिन
मगरघरकावोबेटाइकबड़ाहै
तुम्हेंकाजलदिखाजोआँखउसकी
वहीमेरीग़ज़लकाक़ाफ़ियाहै
ख़ुदाजबसोचताहैतेरीख़ातिर
यहाँतूकिसलिएइतनाडराहै
बुलंदीपरललितकोदेखकरके
ज़मानातोपरेशाँसाहुआहै
  - Lalit Mohan Joshi
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