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Lalit Mohan Joshi
aankh bebas vo nazar mujhko to aayi
aankh bebas vo nazar mujhko to aayi | आँख बेबस वो नज़र मुझको तो आई
- Lalit Mohan Joshi
आँख
बेबस
वो
नज़र
मुझको
तो
आई
जब
से
घर
औलाद
उसकी
यार
बैठी
रो
दिया
वो
बाप
ख़ुद
शायद
बहुत
ही
उसने
नम
बच्चों
की
जब
वो
आँख
देखी
है
समुंदर
में
समाए
दरिया
सारे
वैसे
पलती
बाप
में
ग़म
की
कहानी
- Lalit Mohan Joshi
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खड़ा
हूँ
आज
भी
रोटी
के
चार
हर्फ़
लिए
सवाल
ये
है
किताबों
ने
क्या
दिया
मुझ
को
Nazeer Baaqri
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तुम
भी
लिखना
तुम
ने
उस
शब
कितनी
बार
पिया
पानी
तुम
ने
भी
तो
छज्जे
ऊपर
देखा
होगा
पूरा
चाँद
Nida Fazli
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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मैं
उसे
वो
मुझको
समझाता
रहा
पर
त'अल्लुक़
फिर
भी
मुरझाता
रहा
Madan Mohan Danish
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मैं
तो
मुद्दत
से
ग़ैर-हाज़िर
हूँ
बस
मेरा
नाम
है
रजिस्टर
में
याद
करती
हैं
तुझको
दीवारें
शक्ल
उभर
आई
है
पलस्तर
में
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Azhar Nawaz
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'फ़ैज़'
थी
राह
सर-ब-सर
मंज़िल
हम
जहाँ
पहुँचे
कामयाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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किस
तरह
मेरी
जान
ये
किरदार
बने
है
जो
तुझ
सेे
मिले
है
वो
तेरा
यार
बने
है
Vikram Gaur Vairagi
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ये
आग
वाग
का
दरिया
तो
खेल
था
हम
को
जो
सच
कहें
तो
बड़ा
इम्तिहान
आँसू
हैं
Abhishek shukla
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मैं
पा
सका
न
कभी
इस
ख़लिश
से
छुटकारा
वो
मुझ
से
जीत
भी
सकता
था
जाने
क्यूँँ
हारा
Javed Akhtar
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इस
का
अपनी
ही
रवानी
पर
नहीं
है
इख़्तियार
ज़िंदगी
शिव
की
जटाओं
में
है
गंगा
की
तरह
Ayush Charagh
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ज़िंदगी
दे
दर्द
मुझको
कम
ज़रा
आशिक़ी
दे
दर्द
मुझको
कम
ज़रा
है
समुंदर
क्यूँ
रुलाता
रोज़
फिर
तिश्नगी
दे
दर्द
मुझको
कम
ज़रा
तपती
गर्मी
हो
रहा
देखो
ये
हाल
तफ़्तगी
दे
दर्द
मुझको
कम
ज़रा
संग
बहती
जा
रही
बेजान
लाश
ऐ
नदी
दे
दर्द
मुझको
कम
ज़रा
चल
रहा
है
दौर
ऐसी
बात
का
आदमी
दे
दर्द
मुझको
कम
ज़रा
किसलिए
अब
रो
रहे
हैं
सब
के
सब
मौत
भी
दे
दर्द
मुझको
कम
ज़रा
यार
तन्हाई
में
लब
ख़ामोश
हैं
ख़ामुशी
दे
दर्द
मुझको
कम
ज़रा
ज़िंदगी
से
भी
मुझे
तो
प्यार
था
प्यार
भी
दे
दर्द
मुझको
कम
ज़रा
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Lalit Mohan Joshi
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माज़ी
से
डरकर
बहुत
ही
सहम
जाती
शायद
उस
सेे
वो
उभरना
चाहती
है
Lalit Mohan Joshi
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जैसे
कोई
हसरत
सी
दिल
में
दबी
हो
आँखों
से
उसने
बात
कोई
कही
हो
लगता
है
क्यूँ
हर
बार
ही
देखें
उसको
ज़िंदगी
मेरी
यार
जैसे
वही
हो
मैं
नहीं
रखता
राब्ता
कोई
उस
सेे
यार
दिल
में
जब
उसके
नफ़रत
बसी
हो
जैसे
तैसे
दिल
को
लगाया
है
मैंने
अब
कभी
शायद
ही
मोहब्बत
लिखी
हो
ख़त
सभी
लौटा
अब
उसे
ही
दिए
हैं
सोचते
हैं
ये
फ़ैसला
अब
सही
हो
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Lalit Mohan Joshi
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लोगों
को
मक़बूल
ही
तुम
थे
हम
जहाँ
में
यार
क्यूँँ
गुम
थे
प्यार
जिसने
है
किया
उस
सेे
बाद
में
दिखते
वो
अंजुम
थे
आग
बरपी
है
यहाँ
फिर
क्यूँँ
वो
हमारे
जलते
तारुम
थे
इक
वफ़ा
से
बे-वफ़ा
तक
के
सब
लबों
के
हम
तबस्सुम
थे
छोड़कर
जाने
लगे
हो
तुम
किस
लिए
फिर
याद
में
तुम
थे
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Lalit Mohan Joshi
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कहा
किसने
कि
हक़
में
बात
तुम
मेरे
करो
न
मेरे
ज़ख़्म
को
ऐसे
दुखाओ
अब
यहाँ
Lalit Mohan Joshi
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