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Rohan Hamirpuriya
shauq ka dariyaa bhar gaya kab ka
shauq ka dariyaa bhar gaya kab ka | शौक़ का दरिया भर गया कब का
- Rohan Hamirpuriya
शौक़
का
दरिया
भर
गया
कब
का
तू
नज़र
से
उतर
गया
कब
का
आज
डाली
है
दुनिया
ने
मिट्टी
अपने
अंदर
मैं
मर
गया
कब
का
मुब्तला
करके
इश्क़
में
उस
को
दूजे
रस्ते
गुज़र
गया
कब
का
उसको
गर
इंतिज़ार
है
तो
हो
वादे
से
मैं
मुकर
गया
कब
का
अब
खिलौने
ख़रीदे
जा
सकते
क़र्ज़
सर
से
उतर
गया
कब
का
कैसा
हूँ
क्या
है
हाल
अब
मत
पूछ
ग़म
का
बादल
गुज़र
गया
कब
का
- Rohan Hamirpuriya
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इश्क़
में
कच्चे
नहीं
मात
से
डरते
नहीं
मिलना
था
तुझ
से
मगर
मिलने
को
मरते
नहीं
होंठ
हैं
होंठों
पे
और
आगे
कुछ
करते
नहीं
जिस्म
को
यकदम
छू
लें
इतने
भी
भूखे
नहीं
जान
इक
बेग़म
हैं
दो
मौत
से
डरते
नहीं
पूरे
होने
वाले
हैं
ख़्वाब
जो
सींचे
नहीं
शादी
की
जब
बात
हो
पक्का
है
कहते
नहीं
भूख
दो
की
पैसा
एक
मरते
पर
मरते
नहीं
दो
क़दम
ही
दूर
है
दो
क़दम
चलते
नहीं
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Rohan Hamirpuriya
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जुदाई
नहीं
देगी
जीने
मुझे
वो
देखे
मिरा
दम
निकलते
हुए
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अब
कहाँ
खो
गए
वो
सिलसिले
मुहब्बत
के
इक
वो
भी
वक़्त
था
जब
हर-सू
तू
ही
शामिल
था
Rohan Hamirpuriya
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ये
ख़बर
तो
ज़माने
को
है
झूठ
इज़्ज़त
बचाने
को
है
आ
गया
मेरे
हिस्से
में
वो
बाक़ी
अब
क्या
कमाने
को
है
जान
बोला
नहीं
कॉल
पर
शोर
अब
वो
मचाने
को
है
हम
गए
हैं
दवा
लेने
और
वो
दुकानें
बढ़ाने
को
है
इश्क़
से
तौबा
क्यूँ
करते
हो
मर्ज़
ये
तो
चढ़ाने
को
है
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Rohan Hamirpuriya
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तुझ
सेे
जुदा
है
मेरा
तौर-ए-ज़िन्दगी
उम्मीद
पे
हरगिज़
नहीं
ज़िंदा
रखा
Rohan Hamirpuriya
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