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Khalid Azad
KHvaab men mujhko akshar sehra dikhte hain
KHvaab men mujhko akshar sehra dikhte hain | ख़्वाब में मुझको अक्सर सहरा दिखते हैं
- Khalid Azad
ख़्वाब
में
मुझको
अक्सर
सहरा
दिखते
हैं
लगता
है
अब
ऑंखें
फूट
के
रोएगी
- Khalid Azad
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हर
एक
शख़्स
यहाँ
महव-ए-ख़्वाब
लगता
है
किसी
ने
हम
को
जगाया
नहीं
बहुत
दिन
से
Azhar Iqbal
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माना
कि
सब
के
सामने
मिलने
से
है
हिजाब
लेकिन
वो
ख़्वाब
में
भी
न
आएँ
तो
क्या
करें
Akhtar Shirani
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नए
दौर
के
नए
ख़्वाब
हैं
नए
मौसमों
के
गुलाब
हैं
ये
मोहब्बतों
के
चराग़
हैं
इन्हें
नफ़रतों
की
हवा
न
दे
Bashir Badr
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न
जी
भर
के
देखा
न
कुछ
बात
की
बड़ी
आरज़ू
थी
मुलाक़ात
की
Bashir Badr
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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उम्र
कम
पड़
जायेगी
हर
ख़्वाब
गर
पूरा
हुआ
और
गर
पूरा
न
हो
तो
काटती
है
ज़िंदगी
Ajeetendra Aazi Tamaam
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मत
बताना
कि
बिखर
जाएँ
तो
क्या
होता
है
नईं
नस्लों
को
नए
ख़्वाब
सजाने
देना
Ameer Imam
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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ख़्वाब
इतना
भी
हसीं
मत
देखो
नींद
टूटे
तो
न
ये
शब
गुज़रे
anupam shah
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रात
भर
उन
का
तसव्वुर
दिल
को
तड़पाता
रहा
एक
नक़्शा
सामने
आता
रहा
जाता
रहा
Akhtar Shirani
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ख़ूब
से
ख़ूब
तर
नहीं
होता
कोई
जब
दर-बदर
नहीं
होता
रास्तों
पे
ठहर
तो
जाता
है
पर
मुसाफ़िर
का
घर
नहीं
होता
बारहा
उस
तरफ़
चले
लेकिन
उसकी
जानिब
सफ़र
नहीं
होता
ख़्वाब
को
बेचना
है
मजबूरी
साथ
इसके
गुज़र
नहीं
होता
अपना
सब
कुछ
लुटा
चुका
हो
जो
फिर
उसे
कोई
डर
नहीं
होता
याद
कब
तक
करोगे
तुम
ख़ालिद
क़िस्सा
क्यूँ
मुख़्तसर
नहीं
होता
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Khalid Azad
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कब
यहाँ
कोई
है
सगा
मेरा
फिर
भी
सब
से
है
राब्ता
मेरा
पहले
आँसू
छिपाए
है
ख़ुद
के
तब
कहीं
जा
के
घर
चला
मेरा
रूह
अब
भी
सफ़र
पे
है
मेरी
जिस्म
कब
का
ये
थक
चुका
मेरा
मुझको
सूरज
की
आरज़ू
क्यूँ
हो
जब
दिया
काम
कर
गया
मेरा
कैसे
ग़म
से
जुदा
में
हो
जाऊँ
बस
वही
साथ
दे
रहा
मेरा
कश्ती
डूबी
थी
बाद
में
मेरी
पहले
डूबा
था
हौसला
मेरा
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Khalid Azad
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ख़ाली
जेब
ही
सब
से
भारी
होती
है
चलने
में
कितनी
दुश्वारी
होती
है
Khalid Azad
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हमारे
जनवरी
के
ग़म
दिसंबर
से
ज़्यादा
हैं
बता
ऐ
साल-ए-नौ
ख़ुशियाँ
मनाएं
किस
तरह
से
हम
Khalid Azad
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मिज़ाज-ए-इश्क़
में
मजनू
के
ख़ानदानी
हैं
सो
हम
को
इश्क़
में
आसानियां
नहीं
भातीं
Khalid Azad
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