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Khalid Azad
ik roz apni saari thakan ko utaar kar
ik roz apni saari thakan ko utaar kar | इक रोज़ अपनी सारी थकन को उतार कर
- Khalid Azad
इक
रोज़
अपनी
सारी
थकन
को
उतार
कर
जाना
पड़ेगा
यार
बदन
को
उतार
कर
- Khalid Azad
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दुनिया
की
नज़रों
में
हम
तो
जोकर
हैं
सबको
ख़ुश
रक्खें
मतलब
वो
जोकर
हैं
ख़त्म
कहानी
कर
के
जब
तुम
ही
ख़ुश
हो
अपना
क्या
है
यार
अपन
तो
जोकर
हैं
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Nadim Nadeem
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एक
ही
नदी
के
हैं
ये
दो
किनारे
दोस्तो
दोस्ताना
ज़िंदगी
से
मौत
से
यारी
रखो
Rahat Indori
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हमारे
दरमियाँ
जो
प्यार
से
पहले
की
यारी
थी
बिछड़
कर
अब
ये
लगता
है
वो
यारी
ज़्यादा
प्यारी
थी
बिछड़ना
उसकी
मर्ज़ी
थी,
उसे
उतरन
न
कहना
तुम
वो
अब
उतनी
ही
उसकी
है
वो
तब
जितनी
तुम्हारी
थी
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Alankrat Srivastava
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यार
बिछड़कर
तुमने
हँसता
बसता
घर
वीरान
किया
मुझको
भी
आबाद
न
रक्खा
अपना
भी
नुक़्सान
किया
Ali Zaryoun
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सखी
को
हमारी
नज़र
लग
न
जाए
उसे
ख़्वाब
में
रात
भर
देखते
हैं
Sahil Verma
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अब
उस
सेे
दोस्ती
है
जिस
सेे
कल
मुहब्बत
थी
अब
इस
सेे
ज़्यादा
बुरा
वक़्त
कुछ
नहीं
है
दोस्त
Vishal Singh Tabish
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और
फिर
लोग
यही
कहते
फिरेंगे
इक
दिन
यार
कल
ही
तो
मेरी
बात
हुई
थी
उस
सेे
Saad Ahmad
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जैसे
पतवार
सफ़ीने
के
लिए
होते
हैं
दोस्त
अहबाब
तो
जीने
के
लिए
होते
हैं
इश्क़
में
कोई
तमाशा
नहीं
करना
होता
अश्क
जैसे
भी
हों
पीने
के
लिए
होते
हैं
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Khalid Nadeem Shani
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मैं
दिल
को
सख़्त
करके
उस
गली
जा
तो
रहा
हूँ
दोस्त
करूँँगा
क्या
अगर
वो
ही
शरारत
पर
उतर
आया
Harsh saxena
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फिर
आज
यारों
ने
तुम्हारी
बात
की
फिर
यार
महफ़िल
में
मिरी
खिल्ली
उड़ी
Harsh saxena
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हमें
दरकार
है
फिर
इक
सफ़र
की
ज़रा
सा
काम
बाक़ी
रह
गया
है
Khalid Azad
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इश्क़
कब
ला-जवाल
होता
है
हाँ
मगर
बे-मिसाल
होता
है
उम्र
के
इक
पड़ाव
पे
आकर
चुप
भी
रहना
कमाल
होता
है
ख़ून
हमने
दिया
वतन
के
लिए
और
हमीं
से
सवाल
होता
है
पहले
मैं
ही
उदास
रहता
था
अब
उसे
भी
मलाल
होता
है
हिज्र
के
वसवसे
जो
दिल
में
हों
फिर
तो
जीना
मुहाल
होता
है
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Khalid Azad
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किसी
की
अब
ज़रूरत
हो
रही
है
यही
अब
दिल
की
चाहत
हो
रही
है
कहाँ
ठहरेगा
दिल
का
क़ाफ़िला
ये
अभी
तक
इसकी
हिजरत
हो
रही
है
पड़ी
है
इश्क़
में
जब
से
मेरे
दिन
ब-दिन
वो
ख़ूब-सूरत
हो
रही
है
बिछड़
कर
फिर
उसे
एहसास
होगा
मोहब्बत
अब
मोहब्बत
हो
रही
है
कभी
उनके
ग़मों
पे
मैं
हंसा
था
तो
अपनी
आज
शिरकत
हो
रही
है
सभी
इल्ज़ाम
मुझ
पर
आ
रहे
हैं
अजब
दिल
की
वकालत
हो
रही
है
बिना
सजदे
ही
आँसू
गिर
रहे
हैं
कि
अब
सच्ची
इबादत
हो
रही
है
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Khalid Azad
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ज़िंदगी
पर
अज़ाब
टूट
गया
जब
कहीं
कोई
ख़्वाब
टूट
गया
सारे
जुगनू
उदास
बैठे
हैं
क्या
कोई
आफ़ताब
टूट
गया
हुस्न
के
पत्थरों
से
टकरा
कर
दिल
मेरा
बे-हिसाब
टूट
गया
जब
से
आंगन
में
उठ
गई
दीवार
घर
का
सारा
निसाब
टूट
गया
मुफलिसी
घर
में
क्या
हुई
दाख़िल
एक
इज़्ज़त-मआब
टूट
गया
वो
नज़र
आ
गए
हैं
जब
मुझको
फिर
ये
सारा
हिजाब
टूट
गया
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Khalid Azad
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रुक
गर्दिशे-ए-अय्याम
तुझे
मेरी
क़सम
है
कर
अब
मुझे
गुमनाम
तुझे
मेरी
क़सम
है
चाहत
है
कि
हम
तेरी
असीरी
में
मरे
अब
रख
दे
कोई
इल्ज़ाम
तुझे
मेरी
क़सम
है
ऐ
जिस्म
अभी
साथ
दे
बस
पास
है
मंज़िल
बस
और
ये
दो
गाम
तुझे
मेरी
क़सम
है
कुछ
तो
हो
मेरे
पास
मुहब्बत
की
निशानी
दे
हिज्र
का
ईनाम
तुझे
मेरी
क़सम
है
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Khalid Azad
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