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Khalid Azad
usii ki dastaras men aa gaya hooñ
usii ki dastaras men aa gaya hooñ | उसी की दस्तरस में आ गया हूँ
- Khalid Azad
उसी
की
दस्तरस
में
आ
गया
हूँ
मैं
अब
फिर
से
क़फ़स
में
आ
गया
हूँ
मेरा
बुझना
यहाँ
वाजिब
है
अब
तो
हवाओं
के
जो
बस
में
आ
गया
हूँ
तुम्हारा
हिज्र
कटता
भी
नहीं
अब
ये
किस
उम्र-ए-बरस
में
आ
गया
हूँ
मेरी
पहचान
है
तुम
सेे
फ़क़त
अब
तुम्हारे
रंग-ओ-रस
में
आ
गया
हूँ
बड़ा
मुश्किल
है
दिल
का
शाद
होना
कि
दुनिया
की
हवस
में
आ
गया
हूँ
जो
चाहो
तुम
मुझे
अब
रंग
दे
दो
तुम्हारे
कैनवस
में
आ
गया
हूँ
- Khalid Azad
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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फिर
किसी
के
सामने
चश्म-ए-तमन्ना
झुक
गई
शौक़
की
शोख़ी
में
रंग-ए-एहतराम
आ
ही
गया
Asrar Ul Haq Majaz
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इश्क़
के
रंग
में
ऐ
मेरे
यार
रंग
आया
फिर
आज
रंगों
का
तेहवार
रंग
हो
गुलाबी
या
हो
लाल
पीला
हरा
आ
लगा
दूँ
तुझे
भी
मैं
दो
चार
रंग
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Afzal Ali Afzal
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अब
की
होली
में
रहा
बे-कार
रंग
और
ही
लाया
फ़िराक़-ए-यार
रंग
Imam Bakhsh Nasikh
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रंग
उतर
जाता
है
दीवारों
का
भी
जब
तेरी
तस्वीर
उतारी
जाती
है
Tanoj Dadhich
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हमीं
जब
न
होंगे
तो
क्या
रंग-ए-महफ़िल
किसे
देख
कर
आप
शरमाइएगा
Jigar Moradabadi
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आप
दस्ताने
पहनकर
छू
रहे
हैं
आग
को
आप
के
भी
ख़ून
का
रंग
हो
गया
है
साँवला
Dushyant Kumar
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तुम्हारी
इक
झलक
से
रंग
उल्फत
के
उड़ाए
हैं
नज़ारों
की
नज़ाकत
को
ज़रा
देखो
मेरी
जानाँ
Aniket sagar
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मत
पूछ
कि
क्या
हाल
है
मेरा
तेरे
पीछे
तू
देख
कि
क्या
रंग
है
तेरा,
मेरे
आगे
Mirza Ghalib
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रंग
और
नस्ल
ज़ात
और
मज़हब
जो
भी
है
आदमी
से
कमतर
है
इस
हक़ीक़त
को
तुम
भी
मेरी
तरह
मान
जाओ
तो
कोई
बात
बने
Sahir Ludhianvi
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सब
के
सब
असबाब
यहाँ
पे
रक्खे
हैं
हम
को
बस
तस्वीर
से
तेरी
मतलब
है
Khalid Azad
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हम
पे
कब
ये
दुनिया
इतनी
भारी
थी
कंधे
पे
बस
घर
की
ज़िम्मेदारी
थी
Khalid Azad
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रुक
गर्दिशे-ए-अय्याम
तुझे
मेरी
क़सम
है
कर
अब
मुझे
गुमनाम
तुझे
मेरी
क़सम
है
चाहत
है
कि
हम
तेरी
असीरी
में
मरे
अब
रख
दे
कोई
इल्ज़ाम
तुझे
मेरी
क़सम
है
ऐ
जिस्म
अभी
साथ
दे
बस
पास
है
मंज़िल
बस
और
ये
दो
गाम
तुझे
मेरी
क़सम
है
कुछ
तो
हो
मेरे
पास
मुहब्बत
की
निशानी
दे
हिज्र
का
ईनाम
तुझे
मेरी
क़सम
है
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Khalid Azad
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हमें
सुनाओ
कहानी
उदास
लोगों
की
हमारा
दिल
तो
इसी
से
हरा
भरा
होगा
Khalid Azad
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टूट
के
किस
तरह
बिखर
जाऊँ
ऐसे
हालात
में
किधर
जाऊँ
तीरगी
यूँँ
बसी
है
आँखों
में
ख़ुद
की
परछाई
से
भी
डर
जाऊँ
दूर
इतना
मैं
आ
चुका
हूँ
अब
सोचता
हूँ
कि
कैसे
घर
जाऊँ
रास्ता
ख़ुद-ब-ख़ुद
ही
चलता
है
ये
अलग
बात
मैं
ठहर
जाऊँ
फिर
बुलंदी
पे
जा
के
क्या
हासिल
उसके
दिल
से
ही
गर
उतर
जाऊँ
दिल
की
आख़िर
यही
तमन्ना
है
तेरे
कूचे
से
अब
गुज़र
जाऊँ
एक
उसकी
दु'आ
से
ही
ख़ालिद
क्या
पता
डूब
कर
उभर
जाऊँ
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Khalid Azad
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