nigaah-e-shauq ko ye qurb haasil ho raha hai | निगाह-ए-शौक़ को ये क़ुर्ब हासिल हो रहा है

  - Kaif Uddin Khan
निगाह-ए-शौक़कोयेक़ुर्बहासिलहोरहाहै
तेराचहरामेरीआँखोंकेक़ाबिलहोरहाहै
मुझेदरियासेनिस्बतइसक़दरहैपूछिएमत
जिसेमैंछूरहाहूँवोभीसाहिलहोरहाहै
हद-ए-अफ़लाक़सेआगेनहींरस्तामुहय्या
मेरीपरवाज़मेंइकशक़्सहाइलहोरहाहै
निकलकरवस्फ़बहतेहैंतेरीआँखोंसेऐसे
तूजिसकोदेखताहैवोभीक़ातिलहोरहाहै
तुझेछूनाख़सारेकेसिवाकुछभीनहींअब
तुझेछूनेसेपत्थरजोमेरादिलहोरहाहै
शरीक-ए-मर्गतोहूँपरक़ज़ासेबेख़बरहूँ
वोरस्ताहूँमैंजोख़ुदअपनीमंज़िलहोरहाहै
  - Kaif Uddin Khan
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