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Kaffir
main to bas ik safar ka hi parinda hooñ
main to bas ik safar ka hi parinda hooñ | मैं तो बस इक सफ़र का ही परिंदा हूँ
- Kaffir
मैं
तो
बस
इक
सफ़र
का
ही
परिंदा
हूँ
सफ़र
के
ख़त्म
होने
तक
ही
ज़िंदा
हूँ
मुझे
तुम
ख़्वाब
जन्नत
के
दिखाओ
मत
मैं
दोज़ख़
से
निकाला
इक
दरिंदा
हूँ
- Kaffir
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वो
अजब
शख़्स
था
हर
हाल
में
ख़ुश
रहता
था
उस
ने
ता-उम्र
किया
हँस
के
सफ़र
बारिश
में
Sahiba sheharyaar
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कभी
तो
कोसते
होंगे
सफ़र
को
कभी
जब
याद
करते
होंगे
घर
को
निकल
पड़ती
हैं
औलादें
कमाने
परिंदे
खोल
ही
लेते
हैं
पर
को
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Siddharth Saaz
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बाग़-ए-बहिश्त
से
मुझे
हुक्म-ए-सफ़र
दिया
था
क्यूँँ
कार-ए-जहाँ
दराज़
है
अब
मिरा
इंतिज़ार
कर
Allama Iqbal
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उन्हीं
रास्तों
ने
जिन
पर
कभी
तुम
थे
साथ
मेरे
मुझे
रोक
रोक
पूछा
तिरा
हम-सफ़र
कहाँ
है
Bashir Badr
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यही
तो
एक
तमन्ना
है
इस
मुसाफ़िर
की
जो
तुम
नहीं
तो
सफ़र
में
तुम्हारा
प्यार
चले
Aalok Shrivastav
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'इंशा'-जी
उठो
अब
कूच
करो
इस
शहर
में
जी
को
लगाना
क्या
वहशी
को
सुकूँ
से
क्या
मतलब
जोगी
का
नगर
में
ठिकाना
क्या
Ibn E Insha
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दुश्मनी
का
सफ़र
इक
क़दम
दो
क़दम
तुम
भी
थक
जाओगे
हम
भी
थक
जाएँगे
Bashir Badr
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ज़िंदगी
अपना
सफ़र
तय
तो
करेगी
लेकिन
हम-सफ़र
आप
जो
होते
तो
मज़ा
और
ही
था
Ameeta Parsuram Meeta
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इस
तरह
करता
है
हर
शख़्स
सफ़र
अपना
ख़त्म
ख़ुद
को
तस्वीर
में
रखता
है
चला
जाता
है
Sandeep kumar
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एक
मुद्दत
से
हैं
सफ़र
में
हम
घर
में
रह
कर
भी
जैसे
बेघर
से
Azhar Iqbal
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वो
सारे
झूठ
बोलेंगे
खड़े
होकर
अदालत
में
वहाँ
पर
मसअला
है
लोग
आईना
नहीं
रखते
Kaffir
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ये
सफ़र
का
अंत
मेरा
मैं
मोहब्बत
कर
चुका
हूँ
अब
ख़ुदा
का
ख़ौफ़
नइँ
मैं
तो
बग़ावत
कर
चुका
हूँ
जिस्म
की
अब
भूख
नइँ
नइँ
रूह
की
कोई
ज़रूरत
आख़िरी
लम्हों
के
ख़्वाबों
को
हक़ीक़त
कर
चुका
हूँ
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Kaffir
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प्यासे
का
मान
क्या
है
दुनिया
से
काम
क्या
है
ये
प्यास
ही
न
हो
गर
क्या
दरिया
जाम
क्या
है
Kaffir
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नज़्म-शेरो-शायरी
तो
बद-दिलों
की
बात
है
झेलना
तूफ़ाँ
अभी
क्या
साहिलों
की
बात
है
ज़ख़्म
देकर
क़त्ल
तो
काफ़िर
सभी
करते
मगर
बा-मोहब्बत
क़त्ल
माहिर
क़ातिलों
की
बात
है
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Kaffir
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तिरा
शहर
मेरे
सफ़र
का
भी
हक़दार
है
मिरा
इश्क़
तेरी
वफ़ा
का
तलबगार
है
तिरे
बाद
ये
घाव
मेरे
भरे
ही
नहीं
अकेला
मेरे
मर्ज़
का
तू
गुनहगार
है
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Kaffir
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