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Kaffir
bewajah ye zindagi aisa tamasha kar rahi hai
bewajah ye zindagi aisa tamasha kar rahi hai | बेवजह ये ज़िंदगी ऐसा तमाशा कर रही है
- Kaffir
बेवजह
ये
ज़िंदगी
ऐसा
तमाशा
कर
रही
है
हम
न
जी
सकते
न
ये
'काफ़िर'
जनाज़ा
कर
रही
है
- Kaffir
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वैसे
समुंदर
हूँ
मगर
ख़ुद
को
मैं
क़तरा
भी
मेरा
हासिल
नहीं
वो
भी
मेरा
होकर
ज़रा
सा
मेरे
हिस्से
में
कभी
शामिल
नहीं
मैं
गर
कहूँ
ये
रात
बाक़ी
है
ज़रा
सा
ठहर
मेरी
पलकों
पर
काफ़िर
वो
तो
कहता
है
मेरी
ये
नज़र
अब
चाँद
के
क़ाबिल
नहीं
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ग़ुस्सा
भी
करे
लेकिन
वो
कमाल
लगती
है
काला
जब
पहनती
है
वो
बवाल
लगती
है
मेरा
दिन
उसी
का
है
मेरी
रात
भी
उसकी
ख़ूबसूरती
की
ख़ुद
वो
मिसाल
लगती
है
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ये
तिरा
शहर
मुझ
सेे
कभी
छूटता
ही
नहीं
है
यार
ज़ालिम
मिरा
हाल
तो
पूछता
भी
नहीं
है
ख़्वाब
ख़्वाहिश
दु'आ
सब
में
शामिल
है
ये
शहर
उसका
भूल
जाऊँ
मैं
पर
ये
मुझे
भूलता
ही
नहीं
है
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वो
सारे
झूठ
बोलेंगे
खड़े
होकर
अदालत
में
वहाँ
पर
मसअला
है
लोग
आईना
नहीं
रखते
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ये
सफ़र
का
अंत
मेरा
मैं
मोहब्बत
कर
चुका
हूँ
अब
ख़ुदा
का
ख़ौफ़
नइँ
मैं
तो
बग़ावत
कर
चुका
हूँ
जिस्म
की
अब
भूख
नइँ
नइँ
रूह
की
कोई
ज़रूरत
आख़िरी
लम्हों
के
ख़्वाबों
को
हक़ीक़त
कर
चुका
हूँ
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