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Meem Alif Shaz
zamaane ko tamasha chahiye tha
zamaane ko tamasha chahiye tha | ज़माने को तमाशा चाहिए था
- Meem Alif Shaz
ज़माने
को
तमाशा
चाहिए
था
तभी
तो
इतना
खुल
के
रो
पड़े
हम
- Meem Alif Shaz
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इस
ज़िन्दगी
ने
छीन
ली
चाहत
मिरी
अब
रूठ
भी
जाए
तो
कोई
ग़म
नहीं
Meem Alif Shaz
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तुम्हारे
लफ़्ज़ों
में
इतनी
थकन
क्यूँ
है
ग़ज़ल
ज़िंदा
है
तो
उस
पे
कफ़न
क्यूँ
है
अगर
दौलत
ख़ुशी
का
है
नया
में'यार
अमीरों
की
जबीं
पे
यह
शिकन
क्यूँ
है
ये
माना
है
मोहब्बत
भी
है
इक
नेकी
तो
इस
में
बेवफ़ाई
का
चलन
क्यूँ
है
मुझे
तो
वो
मिला
है
जो
मुक़द्दर
था
मिरे
अपनों
को
मुझ
से
फिर
जलन
क्यूँ
है
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Meem Alif Shaz
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दुश्मनों
से
भी
मिला
करते
हैं
हम
परों
को
भी
सिया
करते
हैं
पैरों
में
काँटे
चुभाने
वाले
हम
मुसीबत
में
हँसा
करते
हैं
जो
प्यासे
हैं
ज़माने
से
वो
तिश्नगी
को
भी
पिया
करते
हैं
भूल
जाते
हैं
हक़ीक़त
अपनी
आसमाँ
को
जो
छुआ
करते
हैं
इश्क़
देखोगे
हमारा
कैसे
हम
तो
ख़्वाबों
में
मिला
करते
हैं
दीप
वो
कैसे
जला
पाएँगे
जो
हवाओं
से
डरा
करते
हैं
रूह
की
ख़ुशबू
को
वो
क्या
जाने
हुस्न
पे
ही
जो
मरा
करते
हैं
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Meem Alif Shaz
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सब
के
सब
शामिल
थे
मेरी
तरक़्क़ी
में
सब
ने
ही
की
थी
बेहद
तनक़ीद
मिरी
Meem Alif Shaz
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भूख
से
जब
इक
छोटा
बच्चा
रोया
माँ
ने
उस
को
खिलौनों
से
बहलाया
Meem Alif Shaz
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