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Meem Alif Shaz
tiri aankhoñ men kaajal bhar raha hooñ
tiri aankhoñ men kaajal bhar raha hooñ | तिरी आँखों में काजल भर रहा हूँ
- Meem Alif Shaz
तिरी
आँखों
में
काजल
भर
रहा
हूँ
कि
तुझ
को
ख़ूब-सूरत
कर
रहा
हूँ
तुझे
इस
पे
तकब्बूर
हो
न
जाए
मैं
बस
यह
सोच
के
ही
डर
रहा
हूँ
- Meem Alif Shaz
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कोई
हसीन
बदन
जिन
की
दस्तरस
में
नहीं
यही
कहेंगे
कि
कुछ
फ़ाएदा
हवस
में
नहीं
Umair Najmi
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मुक़र्रर
दिन
नहीं
तो
लम्हा-ए-इमकान
में
आओ
अगर
तुम
मिल
नहीं
सकती
तो
मेरे
ध्यान
में
आओ
बला
की
ख़ूब-सूरत
लग
रही
हो
आज
तो
जानाँ
मुझे
इक
बात
कहनी
थी
तुम्हारे
कान
में..
आओ
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Darpan
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हसीन
लड़कियाँ
ख़ुश्बूएँ
चाँदनी
रातें
और
इनके
बाद
भी
ऐसी
सड़ी
हुई
दुनिया
Ameer Imam
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बात
करने
का
हसीं
तौर-तरीक़ा
सीखा
हम
ने
उर्दू
के
बहाने
से
सलीक़ा
सीखा
Manish Shukla
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हसीं
ख़्वाबों
को
अपने
साथ
में
ढोती
हुई
आंँखे
बहुत
प्यारी
लगी
हमको
तेरी
सोती
हुई
आंँखे
मोहब्बत
में
ये
दो
क़िस्से
सुना
है
रोज़
होते
हैं
कभी
हँसता
हुआ
चेहरा
कभी
रोती
हुई
आंँखे
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Naimish trivedi
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ख़्वाब
इतना
भी
हसीं
मत
देखो
नींद
टूटे
तो
न
ये
शब
गुज़रे
anupam shah
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कोई
चेहरा
किसी
को
उम्र
भर
अच्छा
नहीं
लगता
हसीं
है
चाँद
भी,
शब
भर
मगर
अच्छा
नहीं
लगता
Munawwar Rana
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कल
मेरी
एक
प्यारी
सहेली
किताब
में
इक
ख़त
छुपा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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जिस
से
पूछे
तेरे
बारे
में
यही
कहता
है
ख़ूब-सूरत
है
वफ़ादार
नहीं
हो
सकता
Abbas Tabish
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इसी
से
होता
है
ज़ाहिर
जो
हाल
दर्द
का
है
सभी
को
कोई
न
कोई
वबाल
दर्द
का
है
किसी
ने
पूछा
के
'फ़रहत'
बहुत
हसीन
हो
तुम
तो
मुस्कुरा
के
कहा
सब
जमाल
दर्द
का
है
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Farhat Abbas Shah
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दिल
की
नस
नस
जुड़ी
है
तिरे
नाम
से
कैसे
भूले
तुझे
एक
दो
जाम
से
मेरी
बीनाई
भी
कम
हुई
जाती
है
इतना
ढूँढा
तुझे
तेरे
पैग़ाम
से
तूने
मेंहदी
रचा
ली
है
हाथों
पे
क्या
दिल
बहुत
ग़म
ज़दा
है
मिरा
शाम
से
अब
पशेमानी
कोई
न
होगी
मुझे
मैं
परेशाँ
था
उल्फ़त
के
ही
काम
से
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Meem Alif Shaz
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अपनी
आँखों
से
आँसू
ओझल
कर
दो
सुरमा
लगा
के
फिर
मुझ
को
पागल
कर
दो
फूलों
से
सीखो
वो
कैसे
हँसते
हैं
फिर
ऐसे
ही
हँस
के
दिल
घाइल
कर
दो
काफ़ी
ग़म
मेरे
चेहरे
पे
रहते
हैं
अपनी
उल्फ़त
का
उन
पे
आँचल
कर
दो
रोया
नहीं
हूँ
मैं
भी
तो
इक
मुद्दत
से
हिज्र
मनाके
अब
मुझ
को
जल
थल
कर
दो
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Meem Alif Shaz
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कैसे
मानूँ
उस
को
मुझ
से
हमदर्दी
है
वो
तो
मिलने
आया
है
नाख़ून
बढ़ाकर
Meem Alif Shaz
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वो
मुझे
बर्बाद
करना
चाहता
है
नासमझ
है
जब
ख़ुदा
आबाद
करना
चाहता
है
नासमझ
है
Meem Alif Shaz
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ज़रूरत
ही
नहीं
अब
हम
को
मुंसिफ
की
कि
अब
क़ातिल
ही
ख़ुद
इंसाफ़
करता
है
Meem Alif Shaz
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