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Meem Alif Shaz
main zubaan ko kaat kar rakh to doon lekin
main zubaan ko kaat kar rakh to doon lekin | मैं ज़ुबाँ को काट कर रख तो दूँ लेकिन
- Meem Alif Shaz
मैं
ज़ुबाँ
को
काट
कर
रख
तो
दूँ
लेकिन
सच
को
तुम
कैसे
मिटाओगे
ज़ुबाँ
से
- Meem Alif Shaz
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सज़ा
सच
बोलने
की
यह
मिली
है
सभी
ने
कर
लिया
हम
से
किनारा
Meem Alif Shaz
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल
तो
जुस्तुजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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तू
है
मुस्लिम
वो
पण्डित
की
बेटी
है
उस
लड़की
पर
तेरा
मरना
ठीक
नहीं
Shadab Asghar
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ये
सच
है
कि
पाँवों
ने
बहुत
कष्ट
उठाए
पर
पाँव
किसी
तरह
राहों
पे
तो
आए
Dushyant Kumar
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हम
अम्न
चाहते
हैं
मगर
ज़ुल्म
के
ख़िलाफ़
गर
जंग
लाज़मी
है
तो
फिर
जंग
ही
सही
Sahir Ludhianvi
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ठीक
से
ज़ख़्म
का
अंदाज़ा
किया
ही
किसने
बस
सुना
था
कि
बिछड़ते
हैं
तो
मर
जाते
हैं
Shariq Kaifi
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अब
ये
भी
नहीं
ठीक
कि
हर
दर्द
मिटा
दें
कुछ
दर्द
कलेजे
से
लगाने
के
लिए
हैं
Jaan Nisar Akhtar
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हमको
हकीम
ने
ही
किया
ठीक
दोस्तों
हम
पर
किसी
के
लम्स
ने
जादू
नहीं
किया
Tanoj Dadhich
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मैं
आज
जो
भी
कहूँगा
तुम
सेे
वो
सच
है
जानम
ये
जान
लो
तुम
मिरी
ग़ज़ल
के
हरेक
मिसरे
से
मेरी
चाहत
झलक
रही
है
Amaan Pathan
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कैसे
दिल
का
हाल
सही
हो
सकता
है
जब-तब
यूँँ
तुम
साड़ी
में
दिख
जाओगी
Tanha
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इश्क़
वाले
ख़ूब
पीते
हैं
ज़रूरी
तो
नहीं
ज़िन्दगी
को
ऐसे
जीते
हैं
ज़रूरी
तो
नहीं
हिज्र
तो
आता
ही
रहता
है
यूँँ
मौसम
की
तरह
हिज्र
में
फिर
और
पीते
हैं
ज़रूरी
तो
नहीं
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Meem Alif Shaz
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मेरे
अंदर
जो
इक
बूढ़ा
रहता
है
कहता
है
दुनिया
से
बचके
रहना
तुम
Meem Alif Shaz
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लोग
मुझ
को
परखने
आए
थे
साथ
अपने
गुलाब
लाए
थे
ज़िंदगी
के
फटे
हुए
पन्ने
साज़िशों
ने
बहुत
जलाए
थे
मेरी
हर
बात
तो
ग़लत
निकली
लोग
सच
भी
ख़रीद
लाए
थे
याद
आता
नहीं
तिरा
चेहरा
इस
क़दर
तुझ
को
हम
भुलाए
थे
इश्क़
होते
ही
जब
मिले
थे
हम
चाँद
के
नीचे
ग़म
सजाए
थे
अपने
ही
घर
में
गैर
थे
हम
भी
जब
से
ग़ुर्बत
में
हम
भी
आए
थे
दूर
तक
आग
फैली
थी
लेकिन
सारे
सफ़्फ़ाक
आग
लाए
थे
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Meem Alif Shaz
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तेरे
अंदर
नहीं
नुक़्स
कोई
अभी
पैसों
के
ज़ोम
से
दूर
रहना
मगर
Meem Alif Shaz
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सलीक़ा
देखो
तुम
इनकार
के
अंदर
ख़ुदा
हाफ़िज़
कहा
धीरे
से
जब
उस
ने
Meem Alif Shaz
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