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Meem Alif Shaz
koi mujh ko ikhttaa kar ke to dekhe
koi mujh ko ikhttaa kar ke to dekhe | कोई मुझ को इखट्टा कर के तो देखे
- Meem Alif Shaz
कोई
मुझ
को
इखट्टा
कर
के
तो
देखे
इश्क़,
सदाक़त,
हसरत
कुछ
तो
निकलेगा
- Meem Alif Shaz
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जो
तुम्हें
मंज़िल
पे
ले
जाएँगी
वो
राहें
अलग
हैं
मैं
वो
रस्ता
हूँ
कि
जिस
पर
तुम
भटक
कर
आ
गई
हो
Harman Dinesh
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दिल-लगी
में
हसरत-ए-दिल
कुछ
निकल
जाती
तो
है
बोसे
ले
लेते
हैं
हम
दो-चार
हँसते
बोलते
Munshi Amirullah Tasleem
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल,
तो
जुस्तजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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हमीं
तलाश
के
देते
हैं
रास्ता
सब
को
हमीं
को
बा'द
में
रस्ता
दिखाया
जाता
है
Varun Anand
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चले
चलिए
कि
चलना
ही
दलील-ए-कामरानी
है
जो
थक
कर
बैठ
जाते
हैं
वो
मंज़िल
पा
नहीं
सकते
Hafeez Banarasi
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ये
जो
दीवार
अँधेरों
ने
उठा
रक्खी
है
मेरा
मक़्सद
इसी
दीवार
में
दर
करना
है
Azm Shakri
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जला
है
जिस्म
जहाँ
दिल
भी
जल
गया
होगा
कुरेदते
हो
जो
अब
राख
जुस्तजू
क्या
है
Mirza Ghalib
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मरने
का
है
ख़याल
ना
जीने
की
आरज़ू
बस
है
मुझे
तो
वस्ल
के
मौसम
की
जुस्तजू
Muzammil Raza
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इश्क़
अगर
बढ़ता
है
तो
फिर
झगड़े
भी
तो
बढ़ते
हैं
आमदनी
जब
बढ़ती
है
तो
ख़र्चे
भी
तो
बढ़ते
हैं
माना
मंज़िल
नहीं
मिली
है
हमको
लेकिन
रोज़ाना
एक
क़दम
उसकी
जानिब
हम
आगे
भी
तो
बढ़ते
हैं
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Tanoj Dadhich
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कटते
भी
चलो,
बढ़ते
भी
चलो,
बाज़ू
भी
बहुत
हैं,
सर
भी
बहुत
चलते
भी
चलो
कि
अब
डेरे
मंज़िल
ही
पे
डाले
जाएँगे
Faiz Ahmad Faiz
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तेरे
अंदर
नहीं
नुक़्स
कोई
अभी
पैसों
के
ज़ोम
से
दूर
रहना
मगर
Meem Alif Shaz
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मैं
अपने
घर
से
तन्हा
जा
रहा
हूँ
दुआएँ
कर
के
तोड़ा
जा
रहा
हूँ
कभी
दीवार
होने
ही
नहीं
दी
सो
भाई
को
मैं
खलता
जा
रहा
हूँ
बिखर
जाऊँ
ज़माना
चाहता
है
मगर
मैं
ऊँचा
बनता
जा
रहा
हूँ
जो
बुझता
ही
नहीं
शातिर
हवा
से
मैं
वो
ही
शम्स
होता
जा
रहा
हूँ
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Meem Alif Shaz
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जो
हमारे
वफ़ादार
हैं
वो
सभी
थोड़े
से
पैसों
के
भी
तलबगार
हैं
Meem Alif Shaz
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तन्हाई
को
साथ
लिए
फिरते
हैं
हम
से
अकेला
रहना
नहीं
आता
है
Meem Alif Shaz
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इतनी
ग़ुरबत
देखी
नहीं
जाती
सूखी
रोटी
भिगो
कर
खाते
हैं
Meem Alif Shaz
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