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Meem Alif Shaz
khushboo ban ke woh to bikhar jaati hai
khushboo ban ke woh to bikhar jaati hai | ख़ुशबू बन के वो तो बिखर जाती है
- Meem Alif Shaz
ख़ुशबू
बन
के
वो
तो
बिखर
जाती
है
जो
भी
ग़ज़ल
तेरे
ही
नाम
लिखी
है
- Meem Alif Shaz
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चूमा
था
एक
दिन
किसी
गुल
की
जबीन
को
लहजे
से
आज
तक
मेरे
ख़ुश्बू
नहीं
गई
Afzal Ali Afzal
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वो
सिर्फ़
फूल
नहीं
ख़ुद
में
ही
क्यारी
था
हमारा
शे'र
तुम्हारी
ग़ज़ल
पे
भारी
था
सब
उसके
चाहने
वाले
सलाम
करते
थे
मैं
उस
हसीन
का
सब
सेे
बड़ा
पुजारी
था
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Vishnu virat
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तुम
सेे
जो
मिला
हूँ
तो
मेरा
हाल
है
बदला
पतझड़
में
भी
जैसे
के
कोई
फूल
खिला
हो
Haider Khan
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साक़ी
कुछ
आज
तुझ
को
ख़बर
है
बसंत
की
हर
सू
बहार
पेश-ए-नज़र
है
बसंत
की
Ufuq Lakhnavi
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इक
गुल
के
मुरझाने
पर
क्या
गुलशन
में
कोहराम
मचा
इक
चेहरा
कुम्हला
जाने
से
कितने
दिल
नाशाद
हुए
Faiz Ahmad Faiz
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बहार
आए
तो
मेरा
सलाम
कह
देना
मुझे
तो
आज
तलब
कर
लिया
है
सहरा
ने
Kaifi Azmi
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छुआ
है
तुमने
भी
इक
रोज़
हमको
ये
ख़ुशबू
देर
तक
महका
करेगी
तुम्हारे
हाथ
सालों
तक
ये
दुनिया
हमारे
नाम
पे
चूमा
करेगी
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Ritesh Rajwada
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हम
उनके
निकाले
हुए
लोगों
में
हैं
शामिल
हर
हाल
में
जीने
का
सलीक़ा
हमें
मालूम
वो
फूल
जो
तोड़े
गए
इज़हार
की
ख़ातिर
आते
हुए
किस
किस
ने
है
रौंदा
हमें
मालूम
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Amrendra Vishwakarma
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ये
भँवरे
रौशनी
खो
देंगे
अपनी
आँखों
की
अगर
चमन
में
जो
कलियाँ
नक़ाब
ओढेंगी
Shajar Abbas
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हर
ख़ुशी
मुस्कुरा
के
कहती
है
दर्द
बनकर
छुपे
हुए
हो
तुम
आज
आब-ओ-हवा
में
ख़ुश्बू
है
लग
रहा
है
घुले
हुए
हो
तुम
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Ritesh Rajwada
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तेरी
नीली
आँखों
ने
उलझाया
है
हम
को
उन
में
ग़ुस्सा
है
या
मोहब्बत
यह
मालूम
नहीं
Meem Alif Shaz
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मैं
किसे
आवाज़
देता
चार
या
पाँच
लोग
तो
ख़ुद
को
बचाने
में
लगे
थे
Meem Alif Shaz
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ठंड
में
भी
कुशादा
मकाँ
ही
रहा
मुफ़लिसों
के
लिए
इम्तिहाँ
ही
रहा
जो
जलाते
रहे
शौक़
से
बस्तियाँ
उनका
बाक़ी
न
कोई
निशाँ
ही
रहा
भूलना
चाहा
तो
फिर
भुला
ही
दिया
इश्क़
लेकिन
सदा
दरमियाँ
ही
रहा
मुझ
से
जलता
रहा
बस
किलसता
रहा
इसलिए
वो
जहाँ
था
वहाँ
ही
रहा
फूल
हो
या
कोई
फूल
सा
जिस्म
हो
ज़ीस्त
के
सच
का
इक
तर्जुमाँ
ही
रहा
जिस
तरफ़
भी
गया
बद्दुआ
ही
मिली
दिल
मगर
मेरा
बस
शादमाँ
ही
रहा
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Meem Alif Shaz
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अगर
आँगन
में
इक
दीवार
हो
जाए
ख़ुशी
से
जीना
भी
दुश्वार
हो
जाए
उछल
के
मत
चलो
तुम
इन
ज़मीनों
पे
कहीं
सिर
से
अलग
दस्तार
हो
जाए
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Meem Alif Shaz
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तुम
भी
अपनी
हद
से
गुज़र
मत
जाना
रिश्तों
को
ठुकरा
के
बिखर
मत
जाना
क़ब्रों
पे
जाना
बंदिश
नहीं
फिर
भी
यह
तो
इक
जंगल
है
उधर
मत
जाना
दुनिया
की
रौनक़
खींचेगी
लेकिन
तुम
भी
इस
दलदल
में
उतर
मत
जाना
जब
तक
गौहर
हाथों
में
आ
न
जाए
तुम
भी
लौट
के
अपने
घर
मत
जाना
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Meem Alif Shaz
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