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Meem Alif Shaz
hamaare zehan men woh shaam tak itnaa raha ai shaaz
hamaare zehan men woh shaam tak itnaa raha ai shaaz | हमारे ज़ेहन में वो शाम तक इतना रहा ऐ शाज़
- Meem Alif Shaz
हमारे
ज़ेहन
में
वो
शाम
तक
इतना
रहा
ऐ
शाज़
कि
अपने
घर
पहुँचते
ही
उसे
आवाज़
दी
हम
ने
- Meem Alif Shaz
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आवाज़
दे
के
देख
लो
शायद
वो
मिल
ही
जाए
वर्ना
ये
उम्र
भर
का
सफ़र
राएगाँ
तो
है
Muneer Niyazi
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इस
शहर
में
जीने
के
अंदाज़
निराले
हैं
होंटों
पे
लतीफ़े
हैं
आवाज़
में
छाले
हैं
Javed Akhtar
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तेरा
लिक्खा
जो
पढ़ूँ
तो
तेरी
आवाज़
सुनूँ
तेरी
आवाज़
सुनूँ
तो
तेरा
चेहरा
देखूँ
Bhaskar Shukla
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तेरी
आवाज़
को
इस
शहर
की
लहरें
तरसती
हैं
ग़लत
नंबर
मिलाता
हूँ
तो
पहरों
बात
होती
है
Ghulam Mohammad Qasir
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मिरी
ख़ामोशियों
की
झील
में
फिर
किसी
आवाज़
का
पत्थर
गिरा
है
Aadil Raza Mansoori
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भटकती
फिर
रही
है
आँख
घर
में
तिरी
आवाज़
इसको
दिख
रही
है
Himanshu Kiran Sharma
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पहले
कहता
है
जुनूँ
उसका
गिरेबान
पकड़
फिर
मेरा
दिल
मुझे
कहता
है
इधर
कान
पकड़
ऐसी
वहशत
भी
न
हो
घर
के
दरो
बाम
कहें
कोई
आवाज़
ही
ले
आ
कोई
मेहमान
पकड़
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Azbar Safeer
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तेरी
आवाज़
मेरा
रिज़्क
हुआ
करती
थी
तू
मुझे
भूख
से
मारेगा
ये
सोचा
नहीं
था
Rafi Raza
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बहुत
बर्बाद
हैं
लेकिन
सदा-ए-इंक़लाब
आए
वहीं
से
वो
पुकार
उठेगा
जो
ज़र्रा
जहाँ
होगा
Ali Sardar Jafri
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वैसे
तो
उसका
नाम
नहीं
हाफ़िज़े
में
अब
मुमकिन
है
रूबरू
जो
कभी
हो,
पुकार
दूँ
Bhaskar Shukla
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यह
बात
सच
है
अब
मोहब्बत
का
ज़माना
ही
नहीं
पहले
जो
हम
सुनते
थे
अब
तो
वो
फ़साना
ही
नहीं
चाँदी
के
बर्तन
और
सोने
के
तो
कंगन
हैं
मगर
माँ
बाप
के
जाने
से
घर
में
अब
ख़ज़ाना
ही
नहीं
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Meem Alif Shaz
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काश
सितारों
को
नीचे
भी
उतारा
होता
काश
चिरागों
को
ऊपर
भी
पुकारा
होता
हम
कुछ
दिन
अपनी
ज़ौजा
के
साथ
ही
रहते
काश
तुम्हारी
चाहत
को
भी
गवारा
होता
कोशिश
जारी
है
क़िस्मत
को
चमकाने
की
काश
हमारी
क़िस्मत
को
भी
सँवारा
होता
छोटे
छोटे
बच्चे
सड़कों
पे
फिरते
हैं
काश
किसी
का
दिल
उन
का
भी
सहारा
होता
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Meem Alif Shaz
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गाँव
अपना
छोड़
आया
तेरी
ख़ातिर
शहर
की
लड़की
मोहब्बत
ख़ूब
करना
Meem Alif Shaz
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तू
तो
अपनी
शातिर
आँखों
का
मुजरिम
है
प्यारे
फिर
बिन्त-ए-हव्वा
पर
क्यूँ
इल्ज़ाम
लगाया
जाए
Meem Alif Shaz
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यह
मोहब्बत
की
शहादत
है
इसे
दिल
से
समझ
जिस
तरफ़
से
भी
मैं
जाऊँ
तेरा
घर
आ
जाता
है
Meem Alif Shaz
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