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Jagveer Singh
tu aur main band ek kamre men hai
tu aur main band ek kamre men hai | तू और मैं बंद एक कमरे में है
- Jagveer Singh
तू
और
मैं
बंद
एक
कमरे
में
है
जैसे
सागर
एक
ही
क़तरे
में
है
इक
भी
शे'र
अगर
भूका
जंगल
में
सारे
हिरण
बराबर
ख़तरे
में
है
- Jagveer Singh
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हैरत
से
जो
यूँँ
मेरी
तरफ़
देख
रहे
हो
लगता
है
कभी
तुम
ने
समुंदर
नहीं
देखा
Aanis Moin
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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आँख
आँसू
को
ऐसे
रस्ता
देती
है
जैसे
रेत
गुज़रने
दरिया
देती
है
कोई
भी
उसको
जीत
नहीं
पाया
अब
तक
वैसे
वो
हर
एक
को
मौक़ा
देती
है
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Kafeel Rana
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बड़े
बूढों
के
घर
को
अब
जो
बच्चे
छोड़
देते
हैं
समुंदर
साहिलों
तक
आ
के
रस्ता
मोड़
देते
हैं
वसीयत
में
कोई
भी
दस्तख़त
जाली
नहीं
होता
ये
पूरे
होश
में
अपने
ही
घर
को
तोड़
देते
हैं
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anupam shah
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शदीद
प्यास
थी
फिर
भी
छुआ
न
पानी
को
मैं
देखता
रहा
दरिया
तिरी
रवानी
को
Shahryar
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बातचीत
में
आला
हो
बस
ठीक
न
हो
फ़ाइदा
क्या
महबूब
अगर
बारीक
न
हो
हम
तेरी
क़ुर्बत
में
अक्सर
सोचते
हैं
दरिया
खेत
के
इतना
भी
नज़दीक
न
हो
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Khurram Afaq
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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चाँद
चेहरा
ज़ुल्फ़
दरिया
बात
ख़ुशबू
दिल
चमन
इक
तुम्हें
दे
कर
ख़ुदा
ने
दे
दिया
क्या
क्या
मुझे
Bashir Badr
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किसी
ने
कहा
था
टूटी
हुई
नाव
में
चलो
दरिया
के
साथ
आप
की
रंजिश
फ़ुज़ूल
है
Shahid Zaki
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कहने
को
तो
अभी
अस्ल
में
सर्दी
है
ऐसी
सर्दी
कि
बस
गर्मी
ही
गर्मी
है
इश्क़
का
ज़ाइक़ा
तो
दिसंबर
में
है
तू
यूँँ
ही
फरवरी-फरवरी
करती
है
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Jagveer Singh
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सफ़र
पर
हैं
सौ
दागिने
दाग़
कर
हमें
नींद
भी
आई
तो
जाग
कर
नहीं
रास
आई
ग़ज़ल
अब
उसे
उसे
शादी
करनी
थी
तब
भाग
कर
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Jagveer Singh
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सच
कहने
से
पहले
इतराते
थे
जब
तेरे
नाम
की
क़सम
खाते
थे
एक
गली
देखी
तो
आया
ये
याद
एक
पते
पर
मेरे
ख़त
जाते
थे
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Jagveer Singh
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कभी
दुख
के
मारे
कभी
शाद
में
ये
आँखें
तरसती
तेरी
याद
में
जो
शायर
ग़म-ए-हिज्र
से
बच
गया
उसे
मुफ़लिसी
खा
गई
बाद
में
दुखी
होनी
थी
तेरी
बेटी
कभी
ज़मीं
पैसा
ही
देखा
दामाद
में
मेरी
रूह
में
ऐसे
उर्दू
बसी
बसे
माँ
का
दिल
जैसे
औलाद
में
तवज्जोह
मिले
इस
सुख़न
को
बहुत
अमाँ
वक़्त
लगता
है
ईजाद
में
महज़
पेट
भरती
है
मेरी
पगार
सुकूँ
मिलता
है
मुझको
बस
दाद
में
मेरी
शा'इरी
डगमगा
जाती
है
तेरी
याद
आती
है
तादाद
में
मोहब्बत
में
आबाद
का
सुख
नहीं
मोहब्बत
का
है
लुत्फ़
बर्बाद
में
तरीक़े
लगाए
थे
काफ़ी
मगर
वो
हर
बार
बोली
नहीं
बाद
में
लगा
दिल
परिंदे
का
सय्याद
से
लगा
सारा
ही
दश्त
फ़रियाद
में
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Jagveer Singh
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ऐसी
ग़रीबी
देखी
है
बिन
सब्ज़ी
रोटी
खाई
है
और
क्या
बुरा
हो
सकता
है
हमने
ग़ज़ल
तक
बेची
है
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Jagveer Singh
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