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jaani Aggarwal taak
vo aaKHir ka fera bhi dekha tha maine
vo aaKHir ka fera bhi dekha tha maine | वो आख़िर का फेरा भी देखा था मैंने
- jaani Aggarwal taak
वो
आख़िर
का
फेरा
भी
देखा
था
मैंने
मुझे
फिर
न
देखा
दोबारा
किसी
ने
- jaani Aggarwal taak
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उस
के
होंटों
पे
रख
के
होंट
अपने
बात
ही
हम
तमाम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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सूरज
लिहाफ़
ओढ़
के
सोया
तमाम
रात
सर्दी
से
इक
परिंदा
दरीचे
में
मर
गया
Athar nasik
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वो
एक
दिन
जो
तुझे
सोचने
में
गुज़रा
था
तमाम
उम्र
उसी
दिन
की
तर्जुमानी
है
Abhishek shukla
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फ़र्क़
इतना
है
कि
तू
पर्दे
में
और
मैं
बे-हिजाब
वर्ना
मैं
अक्स-ए-मुकम्मल
हूँ
तिरी
तस्वीर
का
Asad Bhopali
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घर
की
इस
बार
मुकम्मल
मैं
तलाशी
लूँगा
ग़म
छुपा
कर
मिरे
माँ
बाप
कहाँ
रखते
थे
Unknown
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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या'नी
कि
इश्क़
अपना
मुकम्मल
नहीं
हुआ
गर
मैं
तुम्हारे
हिज्र
में
पागल
नहीं
हुआ
वो
शख़्स
सालों
बाद
भी
कितना
हसीन
है
वो
रंग
कैनवस
पे
कभी
डल
नहीं
हुआ
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Kushal Dauneria
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चाँद
सा
मिस्रा
अकेला
है
मिरे
काग़ज़
पर
छत
पे
आ
जाओ
मिरा
शे'र
मुकम्मल
कर
दो
Bashir Badr
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वो
आदमी
नहीं
है
मुकम्मल
बयान
है
माथे
पे
उस
के
चोट
का
गहरा
निशान
है
वो
कर
रहे
हैं
इश्क़
पे
संजीदा
गुफ़्तुगू
मैं
क्या
बताऊँ
मेरा
कहीं
और
ध्यान
है
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Dushyant Kumar
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अजीब
दर्द
का
रिश्ता
था
सब
के
सब
रोए
शजर
गिरा
तो
परिंदे
तमाम
शब
रोए
Tariq Naeem
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इजाज़त
दो
हमें
ऐसा
बनाएँगे
तुम्हारा
हुस्न
पाक़ीज़ा
बनाएँगे
करेंगे
चित्रकारी
और
आँखों
को
समुंदर
की
तरह
गहरा
बनाएँगे
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jaani Aggarwal taak
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तिरे
उम्र
भर
का
फ़िराक़
ये
मिरे
दो
पलों
की
ख़ुराक
है
तिरी
ज़िन्दगी
है
तबाह
तो
मिरी
ज़िन्दगी
भी
तो
ख़ाक
है
jaani Aggarwal taak
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आ
गए
अपनी
हम
दिखाने
पर
अक़्ल
आ
जाएगी
ठिकाने
पर
पहले
झाँको
गिरेबाँ
ख़ुद
का
तुम
बाद
उसके
कहो
ज़माने
पर
सोचता
हूँ
उसे
फँसा
लूँगा
पर
वो
आता
नहीं
निशाने
पर
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jaani Aggarwal taak
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भटकता
फिर
रहा
दर
दर
किसी
की
कहानी
जानता
हूँ
हर
किसी
की
jaani Aggarwal taak
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छोड़
कर
चल
पड़ी
हवा
मुझ
को
मिलते
हैं
सब
ही
बे-वफ़ा
मुझ
को
मैं
जिन्हें
ज़िन्दगी
समझता
था
मानते
हैं
वो
दूसरा
मुझ
को
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jaani Aggarwal taak
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