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Deepankar
akela hi main yuñ jeeta raha hooñ
akela hi main yuñ jeeta raha hooñ | अकेला ही मैं यूँँ जीता रहा हूँ
- Deepankar
अकेला
ही
मैं
यूँँ
जीता
रहा
हूँ
मैं
बरसों
ही
यहाँ
तन्हा
रहा
हूँ
मियाँ
ख़्वाहिश
हमें
है
ख़्वाब
जीना
तभी
दिन
रात
ही
सोता
रहा
हूँ
फ़क़त
इक
साथ
पाने
को
उसी
का
मैं
ख़ंजर
रोज़
इक
सहता
रहा
हूँ
तुम्हारी
सादगी
सब
से
अलग
है
मैं
तो
हर
रोज़
उस
जैसा
रहा
हूँ
कि
अपनी
प्यास
को
किस
से
कहूँ
हाँ
मैं
दुख
गज़लों
से
ही
कहता
रहा
हूँ
हुआ
था
हादसा
भी
जान
का
इक
हूँ
अब
जो
बच
गया
पछता
रहा
हूँ
- Deepankar
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मौत
ने
सारी
रात
हमारी
नब्ज़
टटोली
ऐसा
मरने
का
माहौल
बनाया
हमने
घर
से
निकले
चौक
गए
फिर
पार्क
में
बैठे
तन्हाई
को
जगह-जगह
बिखराया
हमने
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Shariq Kaifi
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उतरी
हुई
नदी
को
समुंदर
कहेगा
कौन
सत्तर
अगर
हैं
आप
बहत्तर
कहेगा
कौन
पपलू
से
उनकी
बीवी
ने
कल
रात
कह
दिया
मैं
देखती
हूँ
आपको
शौहर
कहेगा
कौन
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Paplu Lucknawi
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यार
सब
जम्अ'
हुए
रात
की
ख़ामोशी
में
कोई
रो
कर
तो
कोई
बाल
बना
कर
आया
Ahmad Mushtaq
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भूला
नहीं
हूँ
आज
भी
हालात
गाँव
के
हाँ,
शहर
आ
गया
हूँ
मगर
साथ
गाँव
के
दुनिया
में
मेरा
नाम
जो
रोशन
हुआ
अगर
जलने
लगेंगे
बल्ब
भी
हर
रात
गाँव
के
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Tanoj Dadhich
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वो
मुझको
जिस
तरह
से
दुआएँ
था
दे
रहा
मैं
तो
समझ
गया
ये
क़यामत
की
रात
हैं
AMAN RAJ SINHA
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आज
की
रात
भी
गुज़री
है
मिरी
कल
की
तरह
हाथ
आए
न
सितारे
तिरे
आँचल
की
तरह
Ameer Qazalbash
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जब
चाहें
सो
जाते
थे
हम,
तुम
सेे
बातें
करके
तब
उल्टी
गिनती
गिनने
से
भी
नींद
नहीं
आती
है
अब
इश्क़
मुहब्बत
पर
ग़ालिब
के
शे'र
सुनाए
उसको
जब
पहले
थोड़ा
शरमाई
वो
फिर
बोली
इसका
मतलब?
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Tanoj Dadhich
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चाँद
तारे
इक
दिया
और
रात
का
कोमल
बदन
सुब्ह-दम
बिखरे
पड़े
थे
चार
सू
मेरी
तरह
Aziz Nabeel
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रात
हो,
चाँद
हो,
बारिश
भी
हो
और
तुम
भी
हो
ऐसा
मुमकिन
ही
नहीं
है
कि
कभी
हो
मिरे
साथ
Faiz Ahmad
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ख़्वाबों
को
आँखों
से
मिन्हा
करती
है
नींद
हमेशा
मुझ
सेे
धोखा
करती
है
उस
लड़की
से
बस
अब
इतना
रिश्ता
है
मिल
जाए
तो
बात
वग़ैरा
करती
है
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Tehzeeb Hafi
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मुसाफ़िर
थे
बिना
ख़्वाहिश
ठिकाना
छोड़
आए
गली
की
चाहतों
का
वो
फ़साना
छोड़
आए
बनें
हम
राम
निकले
इस
दफ़ा
हैं
जो
गुरुकुल
पिता
वासू
यशोदा
का
दिवाना
छोड़
आए
कभी
झंकार
बारिश
की
कभी
बादल
कि
धमकी
नगर
की
शाम
वो
मौसम
सुहाना
छोड़
आए
हुई
तकते
हुए
इक
शख़्स
को
है
रात
से
दिन
मगर
वो
बात
वो
तस्वीर-ख़ाना
छोड़
आए
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Deepankar
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अकेला
ही
मैं
यूँँ
जीता
रहा
हूँ
मैं
बरसों
ही
यहाँ
तन्हा
रहा
हूँ
मियाँ
ख़्वाहिश
हमें
है
ख़्वाब
जीना
तभी
दिन
रात
ही
सोता
रहा
हूँ
फ़क़त
इक
साथ
पाने
को
उसी
का
मैं
ख़ंजर
रोज़
इक
सहता
रहा
हूँ
तुम्हारी
सादगी
सब
से
अलग
है
मैं
तो
हर
रोज़
उस
जैसा
रहा
हूँ
कि
अपनी
प्यास
को
किस
से
कहूँ
हाँँ
मैं
दुख
गज़लों
से
ही
कहता
रहा
हूँ
हुआ
था
हादसा
भी
जान
का
इक
हूँ
अब
जो
बच
गया
पछता
रहा
हूँ
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दिली
दीदार
की
चाहें
बढ़ाते
जा
रहे
हैं
तुम्हें
ही
सोच
आँखों
को
सताते
जा
रहे
हैं
गुज़ारी
है
तुम्हारे
बाद
मैंने
शाम
जो
भी
ख़ुदी
को
आज
भी
क्यूँ
आज़माते
जा
रहे
हैं
हमारे
साथ
जो
भी
हैं
अभी
वो
बाद
में
भी
अकेले
आँख
से
आँसू
बहाते
जा
रहे
हैं
लगाए
घूमते
हैं
जो
लबों
पे
आज
बीड़ी
जवानी
को
धुयें
में
ही
उड़ाते
जा
रहे
हैं
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बला
की
ख़ूब-सूरत
वो
उसे
ही
देख
जीता
हूँ
मुझे
उसकी
ज़रूरत
है,
न
मैं
उसका
चहीता
हूँ
कभी
उसको
परेशानी
मिरे
सिगरेट
से
होती
थी
उसे
बोलो
अभी
कोई
कि
मैं
दारू
भी
पीता
हूँ
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Deepankar
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दिल
नहीं
लग
रहा
कहीं
यारा
हाँ
जहाँ
तू
नहीं
वहीं
यारा
मुंतज़िर
अब
न
आख़िरत
का
हूँ
फ़ैसला
हो
अभी
यहीं
यारा
धर्म
जाते
ये
लोग
ऊपर
के
बात
ये
है
नहीं
ज़हीं
यारा
जो
न
आए
नज़र
नहीं
होता
साथ
दिखता
ख़ुदा
कहीं
यारा
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