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Rohit Gustakh
mujhe to tohfe men gham mile the
mujhe to tohfe men gham mile the | मुझे तो तोहफ़े में ग़म मिले थे
- Rohit Gustakh
मुझे
तो
तोहफ़े
में
ग़म
मिले
थे
तुम्हें
कोई
ग़लत-फ़हमी
हुई
है
- Rohit Gustakh
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अब
उस
जानिब
से
इस
कसरत
से
तोहफ़े
आ
रहे
हैं
कि
घर
में
हम
नई
अलमारियाँ
बनवा
रहे
हैं
Tehzeeb Hafi
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हमने
सँभाल
रक्खे
हैं
अपनी
तिज़ोरी
में
उसके
दिए
वो
तोहफ़े
नहीं
हैं
ख़ज़ाने
हैं
Harsh saxena
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उस
मेहरबाँ
नज़र
की
इनायत
का
शुक्रिया
तोहफ़ा
दिया
है
ईद
पे
हम
को
जुदाई
का
Unknown
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तुम
अगर
सीखना
चाहो
मुझे
बतला
देना
आम
सा
फ़न
तो
कोई
है
नहीं
तोहफ़ा
देना
Jawwad Sheikh
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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आज
भी
शायद
कोई
फूलों
का
तोहफ़ा
भेज
दे
तितलियाँ
मंडला
रही
हैं
काँच
के
गुल-दान
पर
Shakeb Jalali
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तेरी
तासीर
से
कुछ
मेल
खा
जाए
इसी
ख़ातिर
मैं
तोहफ़े
में
गुलाबों
से
सजा
गुलदान
लाई
हूँ
Bhoomi Srivastava
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क्यूँ
परेशाँ
हो
अब
सवालों
पे
धूल
तो
आ
गई
है
बालों
पे
हैं
रकीबों
के
तोहफ़े
साहब
दाँतों
के
सब
निशान
गालों
पे
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A R Sahil "Aleeg"
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और
कुछ
तोहफ़ा
न
था
जो
लाते
हम
तेरे
नियाज़
एक
दो
आँसू
थे
आँखों
में
सो
भर
लाएँ
हैं
हम
Meer Hasan
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कोई
ख़त-वत
नहीं
फाड़ा
कोई
तोहफ़ा
नहीं
तोड़ा
कि
वो
देखे
तो
ख़ुद
सोचे
कि
दिल
तोड़ा,
नहीं
तोड़ा?
Charagh Sharma
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ग़ज़ल
की
नाव
में
बैठे
हुए
हम
तेरे
ग़म
से
किनारा
कर
रहे
है
Rohit Gustakh
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हर
पल
इक
पागल
की
ख़ातिर
ख़्वाब
सजाये
कल
की
ख़ातिर
जिस
पल
में
जीनी
थीं
सदियाँ
आया
वो
इक
पल
की
ख़ातिर
बेच
गिटार
हुआ
दीवाना
तेरी
इस
पायल
की
ख़ातिर
ले
आए
दिल
बुनकर
अपना
सर्दी
में
कम्बल
की
ख़ातिर
ठुकरा
दी
है
जग
की
दौलत
इक
तेरे
आँचल
की
ख़ातिर
ग़ालिब
की
गलियों
में
हम
भी
भटके
नज़्म
ग़ज़ल
की
ख़ातिर
क़ैद
किया
वारिद
को
हमने
आज
तिरे
काजल
की
ख़ातिर
रहती
है
अनबन
पेड़ों
में
उस
मीठी
कोयल
की
ख़ातिर
मोड़
लिया
मुँह
सब
रागों
से
नदियों
की
कल
कल
की
ख़ातिर
ज़ुल्म
सहे
कीचड़
के
हमने
उस
महबूब
कमल
की
ख़ातिर
किसको
अपना
समझे
धरती
जोगिन
है
बादल
की
ख़ातिर
आज
हुई
दिल
से
गुस्ताख़ी
छोड़
दिया
सब
कल
की
ख़ातिर
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Rohit Gustakh
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अचानक
ही
परीक्षा
ज़िन्दगी
ने
ली
रिवीजन
भी
नहीं
करने
दिया
मुझको
Rohit Gustakh
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कहीं
ये
सब्र
खा
जाए
न
हमको
किसी
के
दुख
समेटे
फिर
रहे
हैं
Rohit Gustakh
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अपने
इस
दिल
को
पत्थर
कर
लेंगे
हम
ख़ुद
को
तुझ
से
कमतर
कर
लेंगे
दुनिया
बहरी
हो
जाएगी
इक
दिन
इतनी
ख़ामोशी
अंदर
कर
लेंगे
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Rohit Gustakh
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