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Rohit Gustakh
kahii ye sabr kha jaa.e na hamko
kahii ye sabr kha jaa.e na hamko | कहीं ये सब्र खा जाए न हमको
- Rohit Gustakh
कहीं
ये
सब्र
खा
जाए
न
हमको
किसी
के
दुख
समेटे
फिर
रहे
हैं
- Rohit Gustakh
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यूँँ
ही
बस
वो
मुझको
छोड़
के
सब
सेे
मिलता
रहता
है
बच्चा
भी
तो
ग़लत
किताबें
रख
लेता
है
बस्ते
में
Shahnaz Parveen Sahar
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इक
लड़की
से
बात
करो
तो
लगता
है
इस
दुनिया
को
छोड़
के
भी
इक
दुनिया
है
Shadab Asghar
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इस
दुनिया
के
कहने
पर
उम्मीद
न
रक्खो
पत्थर
रख
लो
सीने
पर
उम्मीद
न
रक्खो
Vishal Singh Tabish
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दिल
ना-उमीद
तो
नहीं
नाकाम
ही
तो
है
लंबी
है
ग़म
की
शाम
मगर
शाम
ही
तो
है
Faiz Ahmad Faiz
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हर
कोई
सब्र
की
तलक़ीन
किया
करता
है
पर
कोई
ये
तो
बताए
कि
करूँँ
मैं,
कैसे?
Afzal Ali Afzal
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उठते
नहीं
हैं
अब
तो
दु'आ
के
लिए
भी
हाथ
किस
दर्जा
ना-उमीद
हैं
परवरदिगार
से
Akhtar Shirani
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इक
दूसरे
को
छोड़
के
जाने
की
बात
है
अपनी
नहीं
ये
सारे
ज़माने
की
बात
है
बस
यूँँ
समझ
लो
उन
सेे
मेरा
कद
बलंद
है
जिनके
लबों
पे
मुझको
गिराने
की
बात
है
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Kashif Sayyed
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जिसकी
फ़ितरत
ही
बे
वफ़ाई
हो
उस
सेे
उम्मीद-ए-वफ़ा
क्या
करना
Ajeetendra Aazi Tamaam
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प्यार
करने
की
हिम्मत
नहीं
उनके
पास
और
हम
सेे
किनारा
भी
होता
नहीं
बात
सीधे
कही
भी
नहीं
जा
रही
और
कोई
इशारा
भी
होता
नहीं
उसको
उम्मीद
है
ऐश
होगी
बसर
साथ
में
जब
रहेगी
मिरे
वो
मगर
मुझपे
जितनी
मुहब्बत
बची
है
सखी
इतने
में
तो
गुज़ारा
भी
होता
नहीं
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
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ख़ुद-कुशी
जुर्म
भी
है
सब्र
की
तौहीन
भी
है
इस
लिए
इश्क़
में
मर
मर
के
जिया
जाता
है
Ibrat Siddiqui
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ये
भी
मशहूर
था
कूचे
में
उस
के
जिसे
तुम
लोग
पागल
कह
रहे
हो
Rohit Gustakh
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किसी
कॉलेज
में
टकराए
तो
कहना
उसे
यारो
तेरे
स्कूल
का
'आशिक़
बहुत
मिस
करता
है
तुझको
Rohit Gustakh
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हमारे
बा'द
चर्चा
कर
रहे
हैं
तिरी
यादों
को
रुस्वा
कर
रहे
हैं
ग़ज़ल
की
नाव
में
बैठे
हुए
हम
तिरे
ग़म
से
किनारा
कर
रहे
हैं
तबस्सुम
था
कभी
गहना
हमारा
उदासी
से
गुज़ारा
कर
रहे
हैं
तिरी
ये
बे-हयाई
और
तग़ाफ़ुल
रक़ीबों
को
इशारा
कर
रहे
हैं
बुरा
है
वक़्त
सो
हम
ज़िंदगी
में
किसी
पर
भी
भरोसा
कर
रहे
हैं
शिकायत
क्या
करें
हम
दुश्मनों
से
हबीबों
से
किनारा
कर
रहे
हैं
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Rohit Gustakh
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वक़्त
की
थी
कमी
गर्दिशों
के
थे
दिन
वक़्त
देना
पड़ा
हर
किसी
के
लिए
Rohit Gustakh
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महकते
हैं
अभी
तक
हाथ
ख़ुशबू
से
कि
गुल
के
गाल
खींचे
थे
कभी
हमने
Rohit Gustakh
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