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Subrat Tripathi
yaad kar zaKHmon ko apne diary bharni pade
yaad kar zaKHmon ko apne diary bharni pade | याद कर ज़ख़्मों को अपने डायरी भरनी पड़े
- Subrat Tripathi
याद
कर
ज़ख़्मों
को
अपने
डायरी
भरनी
पड़े
इस
क़दर
मत
चाहना
की
शा'इरी
करनी
पड़े
- Subrat Tripathi
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मैं
आज
जो
भी
कहूँगा
तुम
सेे
वो
सच
है
जानम
ये
जान
लो
तुम
मिरी
ग़ज़ल
के
हरेक
मिसरे
से
मेरी
चाहत
झलक
रही
है
Amaan Pathan
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हमें
इस
मिट्टी
से
कुछ
यूँँ
मुहब्बत
है
यहीं
पे
निकले
दम
दिल
की
ये
हसरत
है
हमें
क्यूँ
चाह
उस
दुनिया
की
हो
मौला
हमारी
तो
इसी
मिट्टी
में
जन्नत
है
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Harsh saxena
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हम
चाह
कर
भी
टूटते
हैं
हर
दफ़ा
होता
यही
है
इश्क़
का
क्या
क़ायदा
हर
वक़्त
तुम
यूँँ
याद
आते
हो
मुझे
जैसे
नई
दुल्हन
करे
मिस
मायका
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Harsh saxena
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चाह
थी
दो
जहाँ
की
मगर
देखिए
इक
गली
से
गुज़रता
रहा
उम्र
भर
Ashraf Jahangeer
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अगरचे
इश्क़
में
मजनू
बड़े
बदनाम
होते
हैं
अगरचे
क़ैस
जैसे
आशिक़ों
के
नाम
होते
हैं
भटक
सकती
नहीं
जंगल
में
लैला
चाह
करके
भी
अजी
लैला
को
घर
में
दूसरे
भी
काम
होते
हैं
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Gagan Bajad 'Aafat'
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मुझे
चाह
थी
किसी
और
की,
प
मुझे
मिला
कोई
और
है
मेरी
ज़िन्दगी
का
है
और
सच,
मेरे
ख़्वाब
सा
कोई
और
है
तू
क़रीब
था
मेरे
जिस्म
के,
बड़ा
दूर
था
मेरी
रूह
से
तू
मेरे
लिए
मेरे
हमनशीं
कोई
और
था
कोई
और
है
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Avtar Singh Jasser
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उसकी
चाहत
में
भी
इख़लास
नहीं
था
शायद
और
कुछ
हम
भी
उसे
दिल
से
नहीं
चाह
सके
Salman ashhadi sahil
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तुझको
छू
कर
और
किसी
की
चाह
रखें
हैरत
है
और
लानत
ऐसे
हाथों
पर
Varun Anand
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मैं
चाहता
यही
था
सब
चाह
ख़त्म
हो
अब
फिर
चाहकर
तुम्हें
बदला
ये
ख़याल
मेरा
Abhay Aadiv
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इस
कमरे
में
लाश
पड़ी
है
चाहत
की
और
यहाँ
इक
याद
भटकती
रहती
है
Shivam Tiwari
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तुम
सेे
बिछड़े
कई
महीने
बीत
गए
हैं
मगर
तुम्हारा
नंबर
अब
तक
सेव
रखा
है
Subrat Tripathi
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और
बचा
ही
क्या
पढ़ने
को
उसकी
ऑंखें
पढ़
आया
हूँ
Subrat Tripathi
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कोई
मुखड़ा
नहीं
जचता
कोई
तुम
सेा
नहीं
लगता
तुम्हारे
बिन
मुझे
कोई
सफ़र
अच्छा
नहीं
लगता
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Subrat Tripathi
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चाँद
को
अपने
पकड़
में
कर
चुकी
है
चाँद
की
रौनक
जकड़
के
मर
चुकी
है
याद
रहते
थे
जिसे
तुम
मुँह
ज़बानी
याद
वो
तुम
सेे
बिछड़
के
मर
चुकी
है
तोड़
देता
है
नई
कलियाँ
मसलकर
यार
तेरी
रूह
सड़
के
मर
चुकी
है
रात
जब
चुभने
लगे
तो
ये
समझ
लो
आशिक़ी
तुमको
पकड़
में
कर
चुकी
है
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Subrat Tripathi
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कहा
था
तैश
में
आकर
कि
मुझको
भूल
जा
तू
कहाँ
तक
शा'इरी
से
ज़िंदगी
गुज़रे
समझ
ना
Subrat Tripathi
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