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Gulfam Ajmeri
kitnon ka dil jala rakha hai
kitnon ka dil jala rakha hai | कितनों का दिल जला रक्खा है
- Gulfam Ajmeri
कितनों
का
दिल
जला
रक्खा
है
सब
को
पागल
बना
रक्खा
है
ग़म
नहीं
मैं
अगर
मर
गया
सब
को
ही
सच
बता
रक्खा
है
कोई
ख़तरा
नहीं
अब
हमें
दर
पे
ताला
लगा
रक्खा
है
इतने
भी
हम
नहीं
हैं
शरीफ़
जितना
हल्ला
मचा
रक्खा
है
वरना
कट
जाए
दो
ख़ानदान
राज़
हम
ने
छिपा
रक्खा
है
क़त्ल
जिस
का
अभी
बाक़ी
है
वो
जनाज़ा
उठा
रक्खा
है
जो
भी
पीता
है
फट
पड़ता
है
जाम
में
क्या
मिला
रक्खा
है
- Gulfam Ajmeri
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तेग़-बाज़ी
का
शौक़
अपनी
जगह
आप
तो
क़त्ल-ए-आम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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पूछे
हैं
वजह-ए-गिरिया-ए-ख़ूनी
जो
मुझ
सेे
लोग
क्या
देखते
नहीं
हैं
सब
उस
बे-वफ़ा
का
रंग
Meer Taqi Meer
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सरफ़रोशी
की
तमन्ना
अब
हमारे
दिल
में
है
देखना
है
ज़ोर
कितना
बाज़ू-ए-क़ातिल
में
है
Bismil Azimabadi
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उस
के
क़त्ल
पे
मैं
भी
चुप
था
मेरा
नंबर
अब
आया
मेरे
क़त्ल
पे
आप
भी
चुप
हैं
अगला
नंबर
आपका
है
Nawaz Deobandi
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चुरायगा
उसी
से
आँख
क़ातिल
ज़रा
सी
जान
जिस
बिस्मिल
में
होगी
Dagh Dehlvi
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ये
क़त्ल-ए-आम
और
बे-इज़्न
क़त्ल-ए-आम
क्या
कहिए
ये
बिस्मिल
कैसे
बिस्मिल
हैं
जिन्हें
क़ातिल
नहीं
मिलता
वहाँ
कितनों
को
तख़्त
ओ
ताज
का
अरमाँ
है
क्या
कहिए
जहाँ
साइल
को
अक्सर
कासा-ए-साइल
नहीं
मिलता
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Asrar Ul Haq Majaz
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यूँँ
बे-तरतीब
ज़ख़्मों
ने
बताया
राज़
क़ातिल
का
सलीके
से
जो
मेरा
क़त्ल
गर
होता
तो
क्या
होता
Vikram Gaur Vairagi
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दामन
पे
कोई
छींट
न
ख़ंजर
पे
कोई
दाग़
तुम
क़त्ल
करो
हो
कि
करामात
करो
हो
Kaleem Aajiz
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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जब
हाथ
उसका
पकड़ा
तो
कहने
लगी
मेरी
सुनो
शादी
से
पहले
कुछ
नहीं
Gulfam Ajmeri
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अगर
दिल
जो
किसी
का
ताज़ा
टूटे
कोई
आवाज़
दे
तो
सपना
टूटे
बनाए
रखना
दूरी
बज़्म
में
आप
न
जाने
ज़ेहन
का
कब
शीशा
टूटे
नहीं
भर
सकता
फिर
वो
ज़ख़्म
कोई
अगर
जो
वक़्त
पहले
टाँका
टूटे
कोई
कैसे
मिरे
दुख
जान
पाए
?
कोई
तो
हो
जो
मेरे
जैसा
टूटे
मुहब्बत
अब
नहीं
करनी
हमें
यार
कोई
टूटे
भी
तो
फिर
कितना
टूटे
मिरी
माँ
का
तू
भी
तो
दर्द
समझे
मोहब्बत
में
तिरा
भी
लड़का
टूटे
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Gulfam Ajmeri
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गिला
कुछ
भी
नहीं
है
मौत
से
मुझको
पर
ख़ुदा
लेने
अगर
आया
तो
जाऊँगा
मैं
Gulfam Ajmeri
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वैसे
इसका
तो
इरादा
भी
नहीं
जीने
का
अब
फिर
भी
चारा-गर
कोई
कोशिश
ही
कर
के
देख
ले
Gulfam Ajmeri
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तुम
ख़ुदा
ख़ुद
को
अगर
जो
मानते
हो
हिज्र
में
मर
जाने
का
ग़म
जानते
हो
?
मैं
वहीं
हूँ
जो
तुम्हारे
साथ
रोया
तुम
तो
हम
को
अब
कहा
पहचानते
हो
जब
था
ज़िंदा
तो
नहीं
ली
आपने
सुद
बैठ
के
अब
कैसे
मिट्टी
छानते
हो
?
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Gulfam Ajmeri
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