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Gulfam Ajmeri
ishq men zaKHm bhi to dega koii
ishq men zaKHm bhi to dega koii | इश्क़ में ज़ख़्म भी तो देगा कोई
- Gulfam Ajmeri
इश्क़
में
ज़ख़्म
भी
तो
देगा
कोई
उम्र
भर
इनको
फिर
भरेगा
कोई
देख
ले
मेरा
हाल
जो
दुनिया
फिर
मुहब्बत
नहीं
करेगा
कोई
तू
चला
जाएगा
किसी
के
साथ
और
तुझे
ढूॅंढता
फिरेगा
कोई
अब
मैं
अपने
भी
घर
नहीं
जाता
तो
मिरी
राह
क्यूँँ
तकेगा
कोई
मेरे
सब
रास्ते
ग़लत
निकले
तो
मिरे
साथ
क्यूँँ
चलेगा
कोई
अब
मिरी
लाश
फेंक
दो
साहब
ज़ुर्म
ऐसा
नहीं
करेगा
कोई
और
तब
क्या
कहेगा
तू
'गुलफ़ाम'
उसके
बारे
में
पूछ
लेगा
कोई
- Gulfam Ajmeri
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जब
हाथ
उसका
पकड़ा
तो
कहने
लगी
मेरी
सुनो
शादी
से
पहले
कुछ
नहीं
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बस
रह
न
पाए
हम
हमारे
ही
मगर
इस
खेल
में
वैसे
तो
हारे
कुछ
नहीं
पागल
हो
जाए
देख
ले
बस
इक
नज़र
फिर
तो
तुम्हारे
जादू
टोने
कुछ
नहीं
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Gulfam Ajmeri
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सुन
तिरे
बाद
क्या
क्या
हुआ
मेरे
साथ
वो
हुआ
जो
नहीं
होना
था
मेरे
साथ
कौन
करता
है
बर्बाद
किस
को
यहाँ
ज़िंदगी
शर्त
कोई
लगा
मेरे
साथ
वो
जो
आया
था
देने
दिलासा
मुझे
यूँँ
हुआ
वो
भी
रोने
लगा
मेरे
साथ
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Gulfam Ajmeri
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यूँँ
तो
तिरे
इस
शहर
में
बीमार
बहुत
है
मरने
के
लिए
तो
तेरा
इनकार
बहुत
है
जो
शहर
बसाने
को
मुहब्बत
लगी
होगी
वो
शहर
जलाने
को
तो
अख़बार
बहुत
है
बोसे
वो
तो
देती
रही
कुछ
हम
भी
न
बोले
हमको
तो
मिरी
जान
ये
दरकार
बहुत
है
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Gulfam Ajmeri
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तुझ
से
मिलें
बातें
करें
सो
आ
बैठे
हम
और
इरादे
से
नहीं
आए
हैं
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