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Muhammad Fuzail Khan
yahii ik baat rah-rahkar mire dil ko sataati hai
yahii ik baat rah-rahkar mire dil ko sataati hai | यही इक बात रह-रहकर मिरे दिल को सताती है
- Muhammad Fuzail Khan
यही
इक
बात
रह-रहकर
मिरे
दिल
को
सताती
है
कि
आख़िर
क्यूँ
वो
रोया
था
बिछड़ने
से
ज़रा
पहले
- Muhammad Fuzail Khan
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सुलग
रहे
थे
शजर
दिल
तमाम
भँवरों
के
दिल
अपना
वार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
बहुत
मलाल
हुआ
देखकर
गुलिस्ताँ
में
तमाचा
मार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
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Shajar Abbas
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सूरज
लिहाफ़
ओढ़
के
सोया
तमाम
रात
सर्दी
से
इक
परिंदा
दरीचे
में
मर
गया
Athar nasik
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ये
इश्क़-विश्क़
का
क़िस्सा
तमाम
हो
जाए
सफ़ेद
दाढ़ी
हवस
की
गुलाम
हो
जाए
जवान
लड़कियों
बूढ़ों
से
तुम
रहो
हुश्यार
न
जाने
कौन
कहाँ
आसाराम
हो
जाए
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Paplu Lucknawi
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चाँद
सा
मिस्रा
अकेला
है
मिरे
काग़ज़
पर
छत
पे
आ
जाओ
मिरा
शे'र
मुकम्मल
कर
दो
Bashir Badr
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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या'नी
कि
इश्क़
अपना
मुकम्मल
नहीं
हुआ
गर
मैं
तुम्हारे
हिज्र
में
पागल
नहीं
हुआ
वो
शख़्स
सालों
बाद
भी
कितना
हसीन
है
वो
रंग
कैनवस
पे
कभी
डल
नहीं
हुआ
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Kushal Dauneria
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भरे
हुए
जाम
पर
सुराही
का
सर
झुका
तो
बुरा
लगेगा
जिसे
तेरी
आरज़ू
नहीं
तू
उसे
मिला
तो
बुरा
लगेगा
ये
आख़िरी
कंपकंपाता
जुमला
कि
इस
तअ'ल्लुक़
को
ख़त्म
कर
दो
बड़े
जतन
से
कहा
है
उस
ने
नहीं
किया
तो
बुरा
लगेगा
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Zubair Ali Tabish
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मसअला
ख़त्म
हुआ
चाहता
है
दिल
बस
अब
ज़ख़्म
नया
चाहता
है
Shakeel Jamali
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हर
एक
चौखट
खुली
हुई
थी
हर
इक
दरीचा
खुला
हुआ
था
कि
उसकी
आमद
पे
दर
यहाँ
तक
कि
बेघरों
का
खुला
हुआ
था
ये
तेरी
हम्म
ने
हमें
ही
उलझन
में
डाल
रक्खा
है
वरना
हम
पर
तमाम
साइंस
के
फ़लसफ़ों
का
हर
एक
चिट्ठा
खुला
हुआ
था
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Saad Ahmad
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दुश्मनी
लाख
सही
ख़त्म
न
कीजे
रिश्ता
दिल
मिले
या
न
मिले
हाथ
मिलाते
रहिए
Nida Fazli
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तेरे
क़दमों
से
जो
गलियां
वाक़िफ
थीं
उन
सेे
रिश्ता
एक
पुराना
तोड़
दिया
तुम
क्या
जानो
उन
गलियों
पर
क्या
गुज़री
तुमने
तो
बस
आना-जाना
छोड़
दिया
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Muhammad Fuzail Khan
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क़स
में
अगर
न
तोड़िए
तो
खाइए
ज़रूर
वा'दा
किसी
से
कीजे
तो
निभाइए
ज़रूर
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Muhammad Fuzail Khan
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तेरे
जाने
से
कुछ
बचा
ही
नहीं
तू
जो
होता
तो
क्या
नहीं
होता
Muhammad Fuzail Khan
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वो
जब
मिलेंगे
तो
ये
बात
उन
सेे
पूछेंगे
कि
मिल
के
आपसे
क्यूँ
दुनिया
भूल
जाते
हैं
Muhammad Fuzail Khan
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उनको
भी
ग़लत
जाना
तुमको
भी
ग़लत
जाना
झांका
जो
गिरेबां
में
ख़ुद
को
ही
ग़लत
जाना
Muhammad Fuzail Khan
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