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Divyansh "Dard" Akbarabadi
bete ke haath men lagii talwaar dekh kar
bete ke haath men lagii talwaar dekh kar | बेटे के हाथ में लगी तलवार देख कर
- Divyansh "Dard" Akbarabadi
बेटे
के
हाथ
में
लगी
तलवार
देख
कर
माँ
डर
गई
थी
वक़्त
की
रफ़्तार
देख
कर
- Divyansh "Dard" Akbarabadi
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घर
में
भी
दिल
नहीं
लग
रहा
काम
पर
भी
नहीं
जा
रहा
जाने
क्या
ख़ौफ़
है
जो
तुझे
चूम
कर
भी
नहीं
जा
रहा
रात
के
तीन
बजने
को
है
यार
ये
कैसा
महबूब
है
जो
गले
भी
नहीं
लग
रहा
और
घर
भी
नहीं
जा
रहा
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Tehzeeb Hafi
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पहले
सौ
बार
इधर
और
उधर
देखा
है
तब
कहीं
डर
के
तुम्हें
एक
नज़र
देखा
है
Majrooh Sultanpuri
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यूँँ
देखिए
तो
आँधी
में
बस
इक
शजर
गया
लेकिन
न
जाने
कितने
परिंदों
का
घर
गया
जैसे
ग़लत
पते
पे
चला
आए
कोई
शख़्स
सुख
ऐसे
मेरे
दर
पे
रुका
और
गुज़र
गया
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Rajesh Reddy
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गुज़ार
देते
हैं
रातें
पहलू
में
उसके
जुगनू
को
भी
दर
का
फ़क़ीर
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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मेरे
कमरे
में
उदासी
है
क़यामत
की
मगर
एक
तस्वीर
पुरानी
सी
हँसा
करती
है
Abbas Qamar
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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कोहरा
तो
इस
उदासी
का
घना
है
और
सबका
दिल
भी
पत्थर
का
बना
है
रोने
से
मन
हल्का
होता
होगा
लेकिन
मैं
तो
लड़का
हूँ,
मुझे
रोना
मना
है
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Daqiiq Jabaali
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कोई
ख़ुद-कुशी
की
तरफ़
चल
दिया
उदासी
की
मेहनत
ठिकाने
लगी
Adil Mansuri
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ऐसा
लगता
है
कि
तन्हाई
मुझे
छूती
है
उँगलियाँ
कौन
फिरोता
है
मेरे
बालों
में
Ashok Mizaj Badr
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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क्यूँ
मिरे
फूल
से
चेहरे
यूँँ
है
मुरझाया
सा
तुझ
सा
तो
बाग़-ए-जहाँ
में
कोई
दूजा
भी
नहीं
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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ख़ुद
अपने
हाल
पे
हँसवा
के
फिर
बेबस
किया
मुझको
किसी
पागल
ने
मुझ
को
इस
क़दर
पागल
बना
डाला
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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तू
मिला
तब
मुझे
समझ
आया
मैं
समझता
था
इश्क़
कुछ
भी
नहीं
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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नदी
आँखें
भँवर
ज़ुल्फ़ें
कहाँ
तैरूँ
कहाँ
डूबूँ
कि
तेरे
शहर
में
सब
की
अदाएँ
एक
जैसी
हैं
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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मैं
क़ैद
था
क़फ़स
में
और
वो
उड़
रहा
था
सामने
ये
पहली
बार
था
के
पंख
अहमियत
में
थे
नहीं
मुआ'फ़
कर
दिया
है
हमने
सोच
कर
के
कुछ
मगर
तिरे
गुनाह
तो
ऐ
यार
माज़रत
में
थे
नहीं
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
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