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Dileep Kumar
bichhda to pahle roya bahut
bichhda to pahle roya bahut | बिछड़ा तो पहले रोया बहुत
- Dileep Kumar
बिछड़ा
तो
पहले
रोया
बहुत
और
फिर
ख़ुद
पे
ही
हँस
पड़ा
- Dileep Kumar
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बन
जाते
हैं
जुगनू
अपने
दोस्त
सभी
हैं
दिल-जू
अपने
कोई
भी
साथ
नहीं
हो
तब
बहने
देना
आँसू
अपने
हो
जाते
हैं
बे-क़ाबू
हम
खोलो
ना
यूँँ
गेसू
अपने
मरना
मुश्किल
है
लेकिन
ये
ज़ीस्त
कहाँ
है
क़ाबू
अपने
उसको
भाते
पर
सीरत
से
आती
है
अब
बदबू
अपने
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ख़ुद
ही
अपनी
हौसला-अफ़ज़ाई
की
इतनी
आदत
पड़
गई
तन्हाई
की
शाने
पे
सर
रख
के
रोई
किसके
तुम
कौन
था
जिसने
मिरी
भरपाई
की
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Dileep Kumar
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खौफ़
है
कोई
जो
दिल
से
जाता
नहीं
इसलिए
मैं
तुझे
आज़माता
नहीं
उसके
लहजे
से
ही
मैं
समझ
जाता
हूँ
वो
तो
नाराज़गी
भी
जताता
नहीं
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Dileep Kumar
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सब
सेे
उसे
मोहतात
करता
रहता
हूँ
ज़ाया''
मिरे
जज़्बात
करता
रहता
हूँ
किस
हाल
में,
कैसी,
कहाँ
होगी
वो
अब
ये
फ़िक्र
मैं
दिन-रात
करता
रहता
हूँ
कोई
वजह
है
ही
नहीं
दिलबर,
तुझे
मैं
याद
ही
बे-बात
करता
रहता
हूँ
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Dileep Kumar
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ग़ुरूर
भी
बहुत
हैं
और
दिलकशी
नहीं
रही
तिरे
बिना
ये
ज़िंदगी
भी
ज़िंदगी
नहीं
रही
मिलें
हैं
आज
तीन-चार
साल
बाद
हम
कहीं
मगर
लबों
पे
उस
के
वो
शिकस्तगी
नहीं
रही
सभी
ही
तोड़ते
रहे
किसी
तरह
से
दिल
मिरा
मगर
मिरी
किसी
से
बे-त'अल्लुक़ी
नहीं
रही
ये
एक
शख़्स
का
मलाल
सीख
दे
गया
मुझे
जहाँ
में
अब
'दिलीप'
आदमी-गरी
नहीं
रही
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Dileep Kumar
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