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"Dharam" Barot
diya hai ghaav par achha laga tha
diya hai ghaav par achha laga tha | दिया है घाव पर अच्छा लगा था
- "Dharam" Barot
दिया
है
घाव
पर
अच्छा
लगा
था
लिया
था
मान
तो
बोसा
लगा
था
बहानेबाज़
करता
था
बहाने
था
झूठा
पर
मुझे
सच्चा
लगा
था
न
जाने
खेल
क्या
क्या
जानती
थी
खिलाड़ी
भी
उसे
कच्चा
लगा
था
चला
था
छोड़
कर
मँझधार
पर
साथ
सिखाया
तैरना
ऐसा
लगा
था
बुराई
सामने
कर
दी
थी
मैंने
बताए
आपको
कैसा
लगा
था
उड़े
थे
होश
आईना
भी
तोड़ा
धरम
ख़ुद
को
बुरा
इतना
लगा
था
- "Dharam" Barot
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ये
बात
अभी
सबको
समझ
आई
नहीं
है
दीवाना
है
दीवाना
तमन्नाई
नहीं
है
दिल
मेरा
दुखाकर
ये
मुझे
तेरा
मनाना
मरहम
है
फ़क़त
ज़ख़्म
की
भरपाई
नहीं
है
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Vikram Gaur Vairagi
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चोट
खाई
थी
एक
बार
मगर
उम्र
भर
को
बिखर
गए
हैं
हम
Munazzah Noor
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है
ये
कैसा
सितम
मौला
ये
हैं
दुश्वारियाँ
कैसी
जहाँ
पर
रोना
था
हमको
वहीं
पर
मुस्कुराना
है
Aqib khan
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जब
भी
उस
कूचे
में
जाना
पड़ता
है
ज़ख़्मों
पर
तेज़ाब
लगाना
पड़ता
है
उसके
घर
से
दूर
नहीं
है
मेरा
घर
रस्ते
में
पर
एक
ज़माना
पड़ता
है
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Subhan Asad
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शाख़-दर-शाख़
होती
है
ज़ख़्मी
जब
परिंदा
शिकार
होता
है
Indira Varma
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वो
बड़े
प्यार
से
कहते
हैं
कि
आप
अपने
हैं
और
अपनों
को
ही
तो
ज़ख़्म
दिए
जाते
हैं
Akash Rajpoot
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वो
आदमी
नहीं
है
मुकम्मल
बयान
है
माथे
पे
उस
के
चोट
का
गहरा
निशान
है
वो
कर
रहे
हैं
इश्क़
पे
संजीदा
गुफ़्तुगू
मैं
क्या
बताऊँ
मेरा
कहीं
और
ध्यान
है
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Dushyant Kumar
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सितम
भी
मुझ
पे
वो
करता
रहा
करम
की
तरह
वो
मेहरबाँ
तो
न
था
मेहरबान
जैसा
था
Anwar Taban
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ज़िंदगी
में
आई
वो
जैसे
मेरी
तक़दीर
हो
और
उसी
तक़दीर
से
फिर
चोट
खाना
याद
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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ख़ून
से
सींची
है
मैं
ने
जो
ज़मीं
मर
मर
के
वो
ज़मीं
एक
सितम-गर
ने
कहा
उस
की
है
Javed Akhtar
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जो
ज़िंदगी
थी
ज़िंदगी
रही
नहीं
उदासी
भी
मेरी
मेरी
रही
नहीं
क़रीब
इतना
भी
न
होना
तू
कभी
की
वो
कहे
तेरी
कमी
रही
नहीं
किसान
काम
कर
रहा
है
खेत
में
मगर
ज़मीं
किसानों
की
रहीं
नहीं
लिखा
है
दर्द
को
ग़ज़ल
में
अच्छे
से
सभी
ने
बात
ये
नई
रही
नहीं
ये
बोलने
से
पहले
सोचना
था
दोस्त
थी
दोस्ती
वो
दोस्ती
रही
नहीं
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"Dharam" Barot
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हमें
बस
रुत्बा
क़ाएम
करना
होता
इसी
चक्कर
में
तुम
पर
मरना
होता
हमारे
गाँव
में
पहले
यहाँ
पर
बड़ा
ही
ख़ूब-सूरत
झरना
होता
बताना
नास्तिक
ख़ुद
को
भरम
बस
उसे
भी
बिन
बताए
डरना
होता
इसी
डर
ने
बुरा
बनने
से
रोका
सभी
को
अच्छा
बन
कर
मरना
होता
हो
आमद
जब
अठन्नी
खर्चा
रुपिया
लिया
है
क़र्ज़
कैसे
भरना
होता
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"Dharam" Barot
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साथ
चलने
वाले
सारे
रुक
गए
थे
ज़िंदगी
को
जल्द
जाना
था
जिन्होंने
"Dharam" Barot
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परंपरा
बदल
गई
बढ़े
हैं
दाम
काँसे
के
फ़क़ीरों
ने
बदल
दिया
है
ख़ुद
को
बनियों
की
तरह
"Dharam" Barot
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दो
लड़
रहे
मुल्कों
में
से
कैसा
चुनाव
इंसानियत
को
मार
हिंसा
का
चुनाव
"Dharam" Barot
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