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Dharamraj deshraj
KHuda ke vaaste bas ye muqaddas kaam ho jaa.e
KHuda ke vaaste bas ye muqaddas kaam ho jaa.e | ख़ुदा के वास्ते बस ये मुक़द्दस काम हो जाए
- Dharamraj deshraj
ख़ुदा
के
वास्ते
बस
ये
मुक़द्दस
काम
हो
जाए
जो
उनके
ग़म
की
दौलत
है
वो
मेरे
नाम
ही
जाए
- Dharamraj deshraj
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इश्क़
में
तेरे
गँवा
दी
ये
जवानी
जानेमन
हो
गई
दिलचस्प
अपनी
भी
कहानी
जानेमन
Tanoj Dadhich
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'फ़ैज़'
थी
राह
सर-ब-सर
मंज़िल
हम
जहाँ
पहुँचे
कामयाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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मैं
तो
मुद्दत
से
ग़ैर-हाज़िर
हूँ
बस
मेरा
नाम
है
रजिस्टर
में
याद
करती
हैं
तुझको
दीवारें
शक्ल
उभर
आई
है
पलस्तर
में
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Azhar Nawaz
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दुखे
हुए
लोगों
की
दुखती
रग
को
छूना
ठीक
नहीं
वक़्त
नहीं
पूछा
करते
हैं
यारों
वक़्त
के
मारों
से
Vashu Pandey
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ये
आग
वाग
का
दरिया
तो
खेल
था
हम
को
जो
सच
कहें
तो
बड़ा
इम्तिहान
आँसू
हैं
Abhishek shukla
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दुनिया
के
ताने
सह
लेता
हूँ
इक
अच्छा
बेटा
कहलाना
है
Neeraj Neer
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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तुम
भी
लिखना
तुम
ने
उस
शब
कितनी
बार
पिया
पानी
तुम
ने
भी
तो
छज्जे
ऊपर
देखा
होगा
पूरा
चाँद
Nida Fazli
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दर्द
होता
है
मुस्कुराने
में
कितना
मजबूर
हूँ
ज़माने
में
लुत्फ़
आता
है
ग़म
उठाने
में
ख़ुश
हूँ
अपने
ग़रीब
खा़ने
में
ज़ख़्म
भरते
ज़ुरूर
हैं
लेकिन
वक़्त
लगता
है
ग़म
भुलाने
में
जब
न
होगा
रक़ीब
तू
जग
में
ज़िक्र
होगा
मिरे
फ़साने
में
एक
दूजे
के
बाँट
लेंगें
ग़म
आ
भी
जाओ
गरीबखाने
में।
घर
बुलाता
हूँ
इसलिए
उनको
कुछ
उजाला
हो
आशियाने
में।
मान
भी
जाइये
कहा
दिल
का
फ़ायदा
क्या
है
क़समसाने
में।
दूसरा
तुम"धरम"
न
पाओगे
ढूंढ़कर
देख
लो
ज़माने
में।
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Dharamraj deshraj
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ज़ख़्म
अपने
सभी
भुला
बैठे
बेइरादा
जो
मुस्कुरा
बैठे
अपने
ऐबो-हुनर
बता
दूँगा
पास
मेरे
जो
तू
जरा
बैठे
उनके
हक़
में
उठा
के
हाथों
को
आदमी
को
ख़ुदा
बना
बैठे
आँधियाँ
ग़म
की
चल
रही
थीं
हम
शमाँ
उम्मीद
की
जला
बैठे
रब
से
नज़रें
मिलाएंगे
कैसे
याद
रखना
था
पर
भुला
बैठे
आई
होंठों
पे
है
हँसी
जब
से
बेबसी
अपनी
हम
भुला
बैठे
मेरे
अश'आर
ख़ुद
'धरम'
मुझको
ज़िन्दगी
की
सज़ा
सुना
बैठे
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Dharamraj deshraj
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करके
बुलन्द
हौसला
निकले
जो
घर
से
हम
काँटों
ने
छोड़ा
रास्ता
गुज़रे
जिधर
से
हम
Dharamraj deshraj
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दुश्मनो
की
जो
शरारत
होगी
आँसुओं
में
मेरी
बरकत
होगी
वो
सितम
करते
रहेंगे
तुझ
पर
ज़ुल्म
सहने
की
जो
आदत
होगी
ये
ज़माना
तेरा
दुश्मन
होगा
जब
भी
सच
कहने
की
हिम्मत
होगी
लोग
भूलेंगे
मुहब्बत
जिस
दिन
बस
उसी
रोज़
क़यामत
होगी
याद
रख
तेरी
भी
महलों
वाले
जिस्म
की
जाँ
से
बग़ावत
होगी
लोग
काँधे
पे
उठा
लें
तब
ही
आदमी
को
यहाँ
फुरसत
होगी
क्या
पता
था
कि
ज़माने
में
धरम
बोलना
सच
भी
मुसीबत
होगी
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Dharamraj deshraj
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जाने
किस
-किसको
खा
गई
मिट्टी
ज़ीस्त
क्या
है
बता
गई
मिट्टी
जो
जहाँ
को
बता
चुके
अपना
उनको
अपना
बना
गई
मिट्टी
जिनका
दुनिया
में
नाम
चलता
था
उनको
अपना
बना
गई
मिट्टी
चार
काँधे
पे
जब
गया
कोई
नींद
में
था
जगा
गई
मिट्टी
पास
सब
कुछ
था
अब
नहीं
कुछ
भी
आईना
जब
दिखा
गई
मिट्टी
आम
इंसान
की
विसात
कहाँ
आसमानों
को
खा
गई
मिट्टी
दोस्त
-दुश्मन
सभी
को
ग़म
उसका
जिसको
दूल्हा
बना
गई
मिट्टी
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Dharamraj deshraj
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