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Azhan 'Aajiz'
raunakein hain chashm men lekin namiin hai
raunakein hain chashm men lekin namiin hai | रौनकें हैं चश्म में लेकिन नमीं है
- Azhan 'Aajiz'
रौनकें
हैं
चश्म
में
लेकिन
नमीं
है
हैं
यहाँ
सब
आपकी
गोया
कमीं
है
- Azhan 'Aajiz'
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मुझे
तो
उसका
भीतरी
ग़ुबार
है
निकालना
सो
आँख
चूमता
हूँ
उसके
होंठ
चूमता
नहीं
Siddharth Saaz
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माँग
सिन्दूर
भरी
हाथ
हिनाई
करके
रूप
जोबन
का
ज़रा
और
निखर
आएगा
जिसके
होने
से
मेरी
रात
है
रौशन
रौशन
चाँद
में
आज
वही
अक्स
नज़र
आएगा
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Azhar Iqbal
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भटकती
फिर
रही
है
आँख
घर
में
तिरी
आवाज़
इसको
दिख
रही
है
Himanshu Kiran Sharma
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हुस्न
को
हुस्न
बनाने
में
मिरा
हाथ
भी
है
आप
मुझ
को
नज़र-अंदाज़
नहीं
कर
सकते
Rais Farog
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पुतलियाँ
तक
भी
तो
फिर
जाती
हैं
देखो
दम-ए-नज़अ
वक़्त
पड़ता
है
तो
सब
आँख
चुरा
जाते
हैं
Ameer Minai
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जब
भी
माँगूँ
तेरी
ख़ुशी
माँगूँ
और
दुआएँ
ख़ुदा
तलक
जाएँ
ख़्वाब
आएँ
तो
नींद
यूँँ
महके
आँख
से
ख़ुशबुएँ
छलक
जाएँ
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Ritesh Rajwada
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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तुम्हारा
काम
इतना
है
कि
बस
काजल
लगा
लेना
तुम्हारी
आँख
की
ख़ातिर
नज़ारे
मैं
बनाऊँगा
Khalid Nadeem Shani
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गली
में
बैठे
हैं
उसकी
नज़र
जमाए
हुए
हमारे
बस
में
फ़क़त
इंतिज़ार
करना
है
Swapnil Tiwari
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है
राम
के
वजूद
पे
हिन्दोस्ताँ
को
नाज़
अहल-ए-नज़र
समझते
हैं
उस
को
इमाम-ए-हिंद
Allama Iqbal
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दिल
में
तुझे
रखूँ
तो
अब
मैं
कहाँ
रहूँ
फिर
तलवार
दो
मुझे
रखनी,
इक
मियान
में
अब
कोई
ज़रा
बने
साथी
यार
अब
मिरा
भी
लगता
नहीं
मिरा
ये
दिल,
इस
जहान
में
अब
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Azhan 'Aajiz'
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इस
तरह
मजबूरियों
में
दूर
हैं
अपने
वतन
से
जिस
तरह
परवाज़
करती
है
यहाँ
ये
रूह
तन
से
Azhan 'Aajiz'
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अब
मुझे
आराम
करना
है
मिले
मंज़िल
मिरी
भी
अब
थकन
होने
लगी
सच
में
सफ़र
की
इस
थकन
से
बाग़बाँ
होते
हुए
तेरे
यहाँ
कैसा
सितम
है
रोज़
कोई
तोड़
लेता
है
गुलो-नर्गिस
चमन
से
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Azhan 'Aajiz'
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सुब्ह
उदास
उदास
शाम
उदास
उदास
वीराँ
मयक़दा
कि
जाम
उदास
उदास
आप
क्या
गए
कि
वीराँ
घर
हुआ
दर
उदास
उदास
बाम
उदास
उदास
इस
हयात
के
सफ़र
में
दोस्तों
मंज़िलें
जुदा
कि
गाम
उदास
उदास
इस
क़दर
उदास
हम
हुए
अज़ीज़
शय
लगीं
हमें
तमाम
उदास
उदास
राह-ए-इश्क़
में
मिला
न
कुछ
हमें
बस
मिले
सभी
मक़ाम
उदास
उदास
दश्त
की
तरफ़
निकल
पड़े
मगर
ग़ौर
तो
करो
हैं
राम
उदास
उदास
आ
गया
कि
दौर
क्या
जहान
का
रिन्द
ख़ुश
हुए
इमाम
उदास
उदास
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Azhan 'Aajiz'
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किया
करते
थे
जो
उन
सेे
वफ़ा
हम
मियाँ
पाए
हैं
उसका
ही
सिला
हम
लगे
हैं
इश्क़
में
इलज़ाम
हम
पे
पुकारे
भी
गए
हैं
बे-वफ़ा
हम
शिकायत
ज़िन्दगी
से
भी
नहीं
अब
किसी
से
भी
नहीं
हैं
अब
ख़फ़ा
हम
बिछड़ते
वक़्त
कहना
था
बहुत
कुछ
नहीं
कह
सकते
थे
कुछ
भी
भला
हम
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Azhan 'Aajiz'
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