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Arohi Tripathi
vo agar phir qareeb aa jaa.e
vo agar phir qareeb aa jaa.e | वो अगर फिर क़रीब आ जाए
- Arohi Tripathi
वो
अगर
फिर
क़रीब
आ
जाए
बन
गई
हूँ
नसीब
आ
जाए
- Arohi Tripathi
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तदबीर
के
दस्त-ए-रंगीं
से
तक़दीर
दरख़्शाँ
होती
है
क़ुदरत
भी
मदद
फ़रमाती
है
जब
कोशिश-ए-इंसाँ
होती
है
Hafeez Banarasi
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अपनी
कि़स्मत
में
ही
जब
इश्क़
नहीं
है
यारो
किसलिए
अश्क-ए-लहू
इश्क़
में
जाया
करना
Ajeetendra Aazi Tamaam
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ये
ज़ुल्फ़
अगर
खुल
के
बिखर
जाए
तो
अच्छा
इस
रात
की
तक़दीर
सँवर
जाए
तो
अच्छा
जिस
तरह
से
थोड़ी
सी
तेरे
साथ
कटी
है
बाक़ी
भी
उसी
तरह
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
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Sahir Ludhianvi
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किताब-ए-मुक़द्दर
में
रांझा
दिवाना
मगर
हीर
बेहद
सयानी
लिखी
थी
Amaan Pathan
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जुदा
किसी
से
किसी
का
ग़रज़
हबीब
न
हो
ये
दाग़
वो
है
कि
दुश्मन
को
भी
नसीब
न
हो
Nazeer Akbarabadi
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किसी
को
साल-ए-नौ
की
क्या
मुबारकबाद
दी
जाए
कैलन्डर
के
बदलने
से
मुक़द्दर
कब
बदलता
है
Aitbar Sajid
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जीत
हूँ
जश्न-ए-मुक़द्दर
हूँ
मैं
ठीक
से
देख
सिकंदर
हूँ
मैं
Ritesh Rajwada
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मैं
ख़ुद
भी
यार
तुझे
भूलने
के
हक़
में
हूँ
मगर
जो
बीच
में
कम-बख़्त
शा'इरी
है
ना
Afzal Khan
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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पलटा
दे
तक़दीर
हमारी
आकर
माथा
चूम
हमारा
Siddharth Saaz
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ज़मीं
में
हम
अभी
तो
सो
रहे
हैं
अभी
हम
एक
हैं
हम
दो
रहे
हैं
सफ़र
से
लौट
कर
हम
आ
गए
हैं
मुनाफ़िक
बैठकर
अब
रो
रहे
हैं
लगा
है
दाग़
ये
कपड़ा
उठा
दो
उसी
ही
दाग़
में
सब
धो
रहे
हैं
सभी
का
हाथ
था
जो
हैं
यहाँ
पर
सफों
में
एक
करके
हो
रहे
हैं
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Arohi Tripathi
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दर्द
में
और
ये
मुसीबत
भी
जान
पर
आ
गई
मोहब्बत
भी
कौन
हूँ
मैं
सवाल
करता
है
अब
नहीं
है
तिरी
ज़रूरत
भी
इश्क़
क्या
एक
दिन
कि
होती
है
देख
ली
इश्क़
की
हक़ीक़त
भी
क्या
से
क्या
हो
गए
तिरी
ख़ातिर
क्यूँ
नहीं
आ
रही
क़यामत
भी
छोड़
अब
दूरियाँ
बनाते
हैं
रोकता
है
हमें
शरीयत
भी
टूट
जाए
अगर
भरोसा
तो
काम
आती
नहीं
नसीहत
भी
पूछते
हो
कि
हाल
कैसा
है
ठीक
लगती
नहीं
तबीयत
भी
यार
मोमिन
हमें
बताओ
तो
इश्क़
राहत
भी
दे
अज़ियत
भी
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Arohi Tripathi
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चला
गया
था
कोई
अँधेरा
करके
ज़रा
ज़रा
सा
हमको
तेरा
करके
Arohi Tripathi
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फ़साने
से
हक़ीक़त
बन
गए
हैं
हमारी
वो
मोहब्बत
बन
गए
हैं
मिरी
तो
साँस
चलती
हैं
उन्हीं
से
हमारी
वो
ज़रूरत
बन
गए
हैं
बड़ी
बेकार
आदत
लग
गई
है
मगर
वो
ख़ास
आदत
बन
गए
हैं
मुझे
चाहत
नहीं
ज़र्रा
बराबर
मिरे
दिल
की
हुकूमत
बन
गए
हैं
नमाज़ी
बन
गए
हैं
बाद
काफ़िर
हमारी
जब
इबादत
बन
गए
हैं
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Arohi Tripathi
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हर
घड़ी
इंतिज़ार
करती
हूँ
प्यार
जो
बे-शुमार
करती
हूँ
दूर
हूँ
मानती
हूँ
मैं
तुम
सेे
अब
भी
तुम
सेे
ही
प्यार
करती
हूँ
मुझको
चाहत
नहीं
किसी
की
अब
तुमको
आख़िर
क़रार
करती
हूँ
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Arohi Tripathi
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