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Mohd Arham
tumhaare naam se raushan hua hooñ
tumhaare naam se raushan hua hooñ | तुम्हारे नाम से रौशन हुआ हूँ
- Mohd Arham
तुम्हारे
नाम
से
रौशन
हुआ
हूँ
वगरना
कौन
मुझको
पूछता
था
- Mohd Arham
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सफ़र
में
धूप
तो
होगी
जो
चल
सको
तो
चलो
सभी
हैं
भीड़
में
तुम
भी
निकल
सको
तो
चलो
Nida Fazli
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हम
अपनी
धूप
में
बैठे
हैं
'मुश्ताक़'
हमारे
साथ
है
साया
हमारा
Ahmad Mushtaq
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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इक
दिए
से
एक
कमरा
भी
बहुत
है
दिल
जलाने
से
ये
घर
रौशन
हुआ
है
Neeraj Neer
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अभी
रौशन
हुआ
जाता
है
रस्ता
वो
देखो
एक
औरत
आ
रही
है
Shakeel Jamali
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धूप
पड़े
उस
पर
तो
तुम
बादल
बन
जाना
अब
वो
मिलने
आए
तो
उसको
घर
ठहराना।
तुमको
दूर
से
देखते
देखते
गुज़र
रही
है
मर
जाना
पर
किसी
गरीब
के
काम
न
आना।
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Tehzeeb Hafi
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इतना
सच
बोल
कि
होंटों
का
तबस्सुम
न
बुझे
रौशनी
ख़त्म
न
कर
आगे
अँधेरा
होगा
Nida Fazli
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तारीकियों
को
आग
लगे
और
दिया
जले
ये
रात
बैन
करती
रहे
और
दिया
जले
उस
की
ज़बाँ
में
इतना
असर
है
कि
निस्फ़
शब
वो
रौशनी
की
बात
करे
और
दिया
जले
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Tehzeeb Hafi
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रौशनी
आधी
इधर
आधी
उधर
इक
दिया
रक्खा
है
दीवारों
के
बीच
Obaidullah Aleem
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तेरी
यादों
की
धूप
आने
लगी
है
अभी
खुल
जाएगा
मौसम
हमारा
Subhan Asad
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मोहब्बत
हो
गई
है
खेल
की
बाज़ी
बिछड़
के
अब
कोई
लैला
नहीं
मरती
Mohd Arham
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ये
मेरा
ग़म
भी
तो
कुछ
कम
नहीं
है
कि
हम
दोनों
बिछड़
के
हम
नहीं
है
Mohd Arham
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ख़ूँ
के
आँसू
मुझे
रुलाती
है
जब
कभी
याद
तेरी
आती
है
तेरी
फ़ुर्क़त
में
हमने
जाना
है
कि
घड़ी
शोर
क्यूँ
मचाती
है
एक
बच्चे
ने
क़ब्र
पे
लिक्खा
माँ
ये
दुनिया
बड़ा
सताती
है
रोज़
सूरज
ग़ुरूब
होते
ही
जिस्म
में
रूह
छटपटाती
है
दिल
जो
टूटा
तो
फिर
समझ
आया
काँच
की
चीज़
टूट
जाती
है
जब
भी
बढ़ता
हूँ
मंज़िलों
की
तरफ़
बद्दुआ
उसकी
मुस्कुराती
है
शाम
होते
ही
रोज़
तन्हाई
दिल
के
कोने
में
बैठ
जाती
है
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Mohd Arham
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दिल-ए-सहरा
को
आब-जू
करता
काश
वो
अश्क
से
वुज़ू
करता
दिल
के
हाथों
मैं
चुप
रहा
वरना
बे-वफ़ाई
मैं
हू-ब-हू
करता
जिसने
चाहा
कतर
के
छोड़
दिया
कोई
तो
ज़ख़्म
पर
रफ़ू
करता
उसने
चाहा
था
उसकी
फ़ुर्क़त
में
सर
से
पा
तक
बदन
लहू
करता
तीरगी
से
मुझे
निभानी
थी
रौशनी
वरना
कू-ब-कू
करता
फिर
निकल
आया
अपने
अंदर
से
कब
तलक
ख़ुद
से
गुफ़्तुगू
करता
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Mohd Arham
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लगी
है
भूख
फिर
भी
चुप
खड़ी
है
वो
इक
लड़की
जो
अपने
बाप
सी
है
मुझे
काँधे
पे
बैठा
लो
न
बाबा
ज़मीं
से
दुनिया
छोटी
लग
रही
है
मेरा
कमरा
बयाबाँ
हो
गया
है
तेरी
तस्वीर
जब
से
खो
गई
है
मैं
इतना
रोया
हूँ
तुझ
सेे
बिछड़
कर
मेरी
आँखों
में
मिट्टी
रह
गई
है
लगे
जो
आँख
तो
मैं
ख़्वाब
देखूँ
अभी
तो
नींद
से
बस
दुश्मनी
है
कोई
गोशा
नहीं
आबाद
मुझ
में
मेरी
हर
शय
बयाबाँ
हो
चुकी
है
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Mohd Arham
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