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Mohd Arham
baithe baithe ye sochte hain ham
baithe baithe ye sochte hain ham | बैठे बैठे ये सोचते हैं हम
- Mohd Arham
बैठे
बैठे
ये
सोचते
हैं
हम
क्या
हमें
वो
भी
सोचता
होगा
- Mohd Arham
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ख़ूँ
के
आँसू
मुझे
रुलाती
है
जब
कभी
याद
तेरी
आती
है
तेरी
फ़ुर्क़त
में
हमने
जाना
है
कि
घड़ी
शोर
क्यूँ
मचाती
है
एक
बच्चे
ने
क़ब्र
पे
लिक्खा
माँ
ये
दुनिया
बड़ा
सताती
है
रोज़
सूरज
ग़ुरूब
होते
ही
जिस्म
में
रूह
छटपटाती
है
दिल
जो
टूटा
तो
फिर
समझ
आया
काँच
की
चीज़
टूट
जाती
है
जब
भी
बढ़ता
हूँ
मंज़िलों
की
तरफ़
बद्दुआ
उसकी
मुस्कुराती
है
शाम
होते
ही
रोज़
तन्हाई
दिल
के
कोने
में
बैठ
जाती
है
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तेरी
गलियों
से
जब
गुज़रते
हैं
लोग
हँसते
हैं
ताने
कसते
हैं
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लगी
है
भूख
फिर
भी
चुप
खड़ी
है
वो
इक
लड़की
जो
अपने
बाप
सी
है
मुझे
काँधे
पे
बैठा
लो
न
बाबा
ज़मीं
से
दुनिया
छोटी
लग
रही
है
मेरा
कमरा
बयाबाँ
हो
गया
है
तेरी
तस्वीर
जब
से
खो
गई
है
मैं
इतना
रोया
हूँ
तुझ
सेे
बिछड़
कर
मेरी
आँखों
में
मिट्टी
रह
गई
है
लगे
जो
आँख
तो
मैं
ख़्वाब
देखूँ
अभी
तो
नींद
से
बस
दुश्मनी
है
कोई
गोशा
नहीं
आबाद
मुझ
में
मेरी
हर
शय
बयाबाँ
हो
चुकी
है
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भरी
महफिल
में
मुझको
रुसवा
कर
के
मिला
तुझको
भी
क्या
शर्मिंदा
कर
के
मेरा
दिल
अब
सितमगर
भर
चुका
है
नहीं
है
फ़ाइदा
अब
शिकवा
कर
के
परिंदे
रहते
हैं
चुप
चाप
से
अब
गया
वो
किस
क़दर
वीराना
कर
के
उदासी
खा
न
ले
नस्लें
हमारी
न
जाओ
दूर
ऐसे
तन्हा
कर
के
मैं
पहले
इतना
भी
उजड़ा
नहीं
था
मुझे
छोड़ा
है
उसने
सहरा
कर
के
भरोसा
मुझको
ऐसे
शख़्स
पे
था
कि
जिसने
पेड़
काटा
साया
कर
के
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भरोसा
मुझको
ऐसे
शख़्स
पे
था
की
जिसने
पेड़
काटा
साया
करके
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