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Mohd Arham
ek dariyaa kinaare baithe hain
ek dariyaa kinaare baithe hain | एक दरिया किनारे बैठे हैं
- Mohd Arham
एक
दरिया
किनारे
बैठे
हैं
आज
हम
खु़द
को
हारे
बैठे
हैं
मेरे
शाने
पे
सिर
जो
रखते
थे
अब
वो
किसके
सहारे
बैठे
हैं
आज
वो
मुझ
सेे
मिलने
आएगी
सो
बदन
को
उतारे
बैठे
हैं
मुफ़्लिसी
हाथ
था
में
बैठी
है
बच्चे
भूखे
हमारे
बैठे
हैं
ज़ख़्म
भरने
को
आए
हैं
सारे
सो
तुझे
हम
पुकारे
बैठे
हैं
रात
के
तीन
बज
गए
'अरहम'
आप
किस
ग़म
के
मारे
बैठे
हैं
- Mohd Arham
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अब
जो
कोई
पूछे
भी
तो
उस
से
क्या
शरह-ए-हालात
करें
दिल
ठहरे
तो
दर्द
सुनाएँ
दर्द
थमें
तो
बात
करें
Faiz Ahmad Faiz
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और
भी
दुख
हैं
ज़माने
में
मोहब्बत
के
सिवा
राहतें
और
भी
हैं
वस्ल
की
राहत
के
सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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तेरी
आँखों
में
जो
इक
क़तरा
छुपा
है,
मैं
हूँ
जिसने
छुप
छुप
के
तेरा
दर्द
सहा
है,
मैं
हूँ
एक
पत्थर
कि
जिसे
आँच
न
आई,
तू
है
एक
आईना
कि
जो
टूट
चुका
है,
मैं
हूँ
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Fauziya Rabab
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हम
अपने
दुख
को
गाने
लग
गए
हैं
मगर
इस
में
ज़माने
लग
गए
हैं
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Madan Mohan Danish
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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हर
दुख
का
है
इलाज,
उसे
देखते
रहो
सबकुछ
भुला
के
आज
उसे
देखते
रहो
देखा
उसे
तो
दिल
ने
ये
बे-साख़्ता
कहा
छोड़ो
ये
काम
काज
उसे
देखते
रहो
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Aslam Rashid
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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मुँह
ज़र्द-ओ-आह-ए-सर्द
ओ
लब-ए-ख़ुश्क
ओ
चश्म-ए-तर
सच्ची
जो
दिल-लगी
है
तो
क्या
क्या
गवाह
है
Nazeer Akbarabadi
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हमारे
सैकड़ों
दुख
थे,
और
उस
में
एक
दुख
ये
भी
जो
हम
से
हो
के
गुज़रे
थे,
हमें
दीवार
कहते
थे
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Siddharth Saaz
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दर्द
मारे
है
ऐसे
कश
पे
कश
ज़िस्म
जलता
सिगार
हो
जैसे
Ajeetendra Aazi Tamaam
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मोहब्बत
की
ये
पहली
सीढ़ी
है
जानाँ
मना
करते
नहीं
यूँँ
बोसे
को
अक्सर
Mohd Arham
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उतारी
होगी
जिस
दिन
भी
घड़ी
उसने
यक़ीनन
वक़्त
उस
दिन
रुक
गया
होगा
Mohd Arham
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ज़रा
तो
सोच
दिल
को
तोड़ने
वाले
कि
तेरा
हश्र
के
दिन
हाल
क्या
होगा
Mohd Arham
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लगी
है
भूख
फिर
भी
चुप
खड़ी
है
वो
इक
लड़की
जो
अपने
बाप
सी
है
मुझे
काँधे
पे
बैठा
लो
न
बाबा
ज़मीं
से
दुनिया
छोटी
लग
रही
है
मेरा
कमरा
बयाबाँ
हो
गया
है
तेरी
तस्वीर
जब
से
खो
गई
है
मैं
इतना
रोया
हूँ
तुझ
सेे
बिछड़
कर
मेरी
आँखों
में
मिट्टी
रह
गई
है
लगे
जो
आँख
तो
मैं
ख़्वाब
देखूँ
अभी
तो
नींद
से
बस
दुश्मनी
है
कोई
गोशा
नहीं
आबाद
मुझ
में
मेरी
हर
शय
बयाबाँ
हो
चुकी
है
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Mohd Arham
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तेरी
गलियों
से
जब
गुज़रते
हैं
लोग
हँसते
हैं
ताने
कसते
हैं
Mohd Arham
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