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Prashant Arahat
bichadkar tum se ab dildaar jaani
bichadkar tum se ab dildaar jaani | बिछड़कर तुम से अब दिलदार जानी
- Prashant Arahat
बिछड़कर
तुम
से
अब
दिलदार
जानी
हुआ
जीना
मेरा
दुश्वार
जानी
मिटा
दोगे
पुरानी
चैट
को
तुम
करोगे
या
उसे
अख़बार
जानी
मुझे
तन्हाइयाँ
भाती
नहीं
हैं
गिरा
दूँगा
सभी
दीवार
जानी
खुबानी
सेब
से
भी
लाल
मीठे
रसीले
हैं
लबो
रुख़्सार
जानी
उड़ेंगे
आसमाँ
में
हम
किसी
दिन
करेंगे
तब
तेरा
दीदार
जानी
मुहब्बत
की
गली
से
ही
गुज़र
कर
पढ़े
ग़ालिब
कभी
गुलज़ार
जानी
बुरे
दिन
हैं
कभी
अच्छे
भी
होंगे
सभी
होते
कभी
दो
चार
जानी
कभी
ग़ालिब
कभी
जावेद
को
मैं
कभी
पढ़ता
भगत
सरदार
जानी
मुहब्बत
से
बड़ा
कुछ
भी
नहीं
है
समझता
ही
नहीं
संसार
जानी
- Prashant Arahat
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बहुत
आसान
है
कहना,
बुरा
क्या
है
भला
क्या
है
करोगे
इश्क़
तब
मालूम
होगा,
मसअला
क्या
है
Bhaskar Shukla
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'असद'
ये
शर्त
नहीं
है
कोई
मुहब्बत
में
कि
जिस
सेे
प्यार
करो
उसकी
आरज़ू
भी
करो
Subhan Asad
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वो
जो
पहला
था
अपना
इश्क़
वही
आख़िरी
वारदात
थी
दिल
की
Pooja Bhatia
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किसे
है
वक़्त
मोहब्बत
में
दर-ब-दर
भटके
मैं
उसके
शहर
गया
था
किसी
ज़रूरत
से
Riyaz Tariq
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इश्क़
का
था
खेल
केवल
दौड़
का
बन
के
बल्लेबाज़
शामिल
हो
गया
Divy Kamaldhwaj
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इश्क़
के
इज़हार
में
हर-चंद
रुस्वाई
तो
है
पर
करूँँ
क्या
अब
तबीअत
आप
पर
आई
तो
है
Akbar Allahabadi
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जँचने
लगा
है
दर्द
मुझे
आपका
दिया
बर्बाद
करने
वाले
ने
ही
आसरा
दिया
कल
पहली
बार
लड़ने
की
हिम्मत
नहीं
हुई
मुझको
किसी
के
प्यार
ने
बुजदिल
बना
दिया
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Kushal Dauneria
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तुम्हीं
से
प्यार
मुझको
इसलिए
है
ज़माना
आज़मा
कर
आ
गया
हूँ
Divy Kamaldhwaj
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चलो
करके
देखेंगे
इज़हार
अब
की
मुहब्बत
न
होगी
अदावत
तो
होगी
Tiwari Jitendra
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छोड़ो
दुनिया
की
परवाहें,
करो
मोहब्बत
मुश्किल
हों
कितनी
भी
राहें,
करो
मोहब्बत
सुनकर
देखो
सारे
मंदिर
यही
कहेंगे
यही
कहेंगी
सब
दरगाहें,
करो
मोहब्बत
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Bhaskar Shukla
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बढ़ाकर
हौसलों
को
ही
ये
अपने
पर
बनाते
हैं
उड़ानों
के
लिए
दीवार
को
ही
दर
बनाते
हैं
नहीं
बेघर
कहो
इनको
किताबों
के
ये
'आशिक़
हैं
बिना
परवाह
के
फुटपाथ
को
भी
घर
बनाते
हैं
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Prashant Arahat
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नाम
उसका
है
बहुत
प्यारा
मगर
ये
आरज़ू
है
बस
मेरा
सरनेम
वो
पीछे
लगाना
चाहती
है।
Prashant Arahat
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कहाँ
जाकर
रहेगा
ये
नहीं
मालूम
है
हमको
ठिकाना
सिर्फ़
मजनूँ
का
वही
वर्षों
से
सहरा
है
Prashant Arahat
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चलो
अब
चाय
पीते
हैं
कहीं
पर
तुम्हारे
शहर
में
सर्दी
बहुत
है
Prashant Arahat
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ज़िंदगी
है
चार
दिन
की
लोग
ऐसा
कह
रहे
हैं
चार
दिन
ही
बस
सही
मैं
और
जीना
चाहता
हूँ
Prashant Arahat
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