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Prashant Arahat
kahaan jaakar rahega ye nahin maaloom hai hamko
kahaan jaakar rahega ye nahin maaloom hai hamko | कहाँ जाकर रहेगा ये नहीं मालूम है हमको
- Prashant Arahat
कहाँ
जाकर
रहेगा
ये
नहीं
मालूम
है
हमको
ठिकाना
सिर्फ़
मजनूँ
का
वही
वर्षों
से
सहरा
है
- Prashant Arahat
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ये
दलीलें
और
ये
इल्ज़ाम
यानी
वो
करेगी
अब
मुझे
बदनाम
यानी
हाल
मेरा
पूछते
हो
आज
मुझ
सेे
लग
गया
है
आज
कोई
काम
यानी
बोलते
हैं
जो
अभी
तोते
के
जैसे
वो
बिके
हैं
कौड़ियों
के
दाम
यानी
मैं
नहीं
जाता
कभी
भी
बिन
बुलाए
भेज
सकते
थे
मुझे
पैग़ाम
यानी
ख़ुश
रखे
माँ-बाप
को
जो
भी
हमेशा
ख़ुश
किए
हैं
उसने
चारों
धाम
यानी
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Prashant Arahat
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किनारे
पर
लगाने
को
मेरी
कश्ती
वही
माँझी
बदलकर
रूप
को
अपने
वही
हर
बार
आएगा
Prashant Arahat
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मुसलसल
हम
अगर
मिलते
रहेंगे
बहुत
मशहूर
ये
क़िस्से
रहेंगे
इजाज़त
तुम
अगर
दे
दो
हमें
तो
तुम्हें
हम
ख़्वाब
में
मिलते
रहेंगे
अगर
सपना
हक़ीक़त
बन
गया
तो
क्षितिज
तक
साथ
हम
चलते
रहेंगे
बहुत
सुंदर
बहुत
कोमल
तुम्हारे
लबो
रुख़्सार
ये
खिलते
रहेंगे
अजब
सी
हम
पहेली
हो
गए
क्या
हमेशा
हर
जगह
टलते
रहेंगे
मिले
हैं
जिस
तरह
से
आज
हम
तुम
हमेशा
इस
तरह
मिलते
रहेंगे
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Prashant Arahat
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तुझे
ही
चाहता
हूँ
मैं
तेरा
ही
ख़्वाब
आता
है
तेरे
दीदार
को
अब
भी
मेरी
आँखें
तरसती
हैं
Prashant Arahat
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उसने
मेरी
आँखों
पर
चुपके
से
आकर
हाथ
रखे
इक
चुम्बन
होंठों
पर
लेकर
यूँँ
सारे
जज़्बात
रखे
देख
तुम्हें
बस
मेरे
मन
से
एक
दु'आ
ये
उठती
है
मालिक
इस
जीवन
भर
मुझको
यार
तुम्हारे
साथ
रखे
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