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Ankit gupta
ik khwaab tha vo hamko muyassar nahin hua
ik khwaab tha vo hamko muyassar nahin hua | इक ख़्वाब था वो हमको मुयस्सर नहीं हुआ
- Ankit gupta
इक
ख़्वाब
था
वो
हमको
मुयस्सर
नहीं
हुआ
करना
था
उसको
मोम
वो
पत्थर
नहीं
हुआ
चूमा
है
तुमने
गाल
तो
हम
होंठ
चू
मेंगे
देखो
अभी
हिसाब
बराबर
नहीं
हुआ
- Ankit gupta
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आरज़ू'
जाम
लो
झिजक
कैसी
पी
लो
और
दहशत-ए-गुनाह
गई
Arzoo Lakhnavi
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आशिक़ी
में
'मीर'
जैसे
ख़्वाब
मत
देखा
करो
बावले
हो
जाओगे
महताब
मत
देखा
करो
Ahmad Faraz
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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माना
कि
सब
के
सामने
मिलने
से
है
हिजाब
लेकिन
वो
ख़्वाब
में
भी
न
आएँ
तो
क्या
करें
Akhtar Shirani
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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बढ़
के
इम्कान
से
नुक़्सान
उठाए
हुए
हैं
हम
मुहब्बत
में
बहुत
नाम
कमाए
हुए
हैं
मेरे
मौला
मुझे
ता'बीर
की
दौलत
दे
दे
मैंने
इक
शख़्स
को
कुछ
ख़्वाब
दिखाए
हुए
हैं
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Ejaz Tawakkal Khan
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ये
तेरे
ख़त
ये
तेरी
ख़ुशबू
ये
तेरे
ख़्वाब-ओ-ख़याल
मता-ए-जाँ
हैं
तेरे
कौल
और
क़सम
की
तरह
गुज़िश्ता
साल
मैंने
इन्हें
गिनकर
रक्खा
था
किसी
ग़रीब
की
जोड़ी
हुई
रक़म
की
तरह
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Jaun Elia
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गुलाब
ख़्वाब
दवा
ज़हर
जाम
क्या
क्या
है
मैं
आ
गया
हूँ
बता
इंतिज़ाम
क्या
क्या
है
Rahat Indori
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रो
रही
हूँ
कि
तुम
दिख
न
पाए
कहीं
हाए
ये
ख़्वाब
सिंदूर
है
माँग
में
Neeraj Neer
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ख़मोशी
मेरी
मअनी-ख़ेज़
थी
ऐ
आरज़ू
कितनी
कि
जिस
ने
जैसा
चाहा
वैसा
अफ़्साना
बना
डाला
Arzoo Lakhnavi
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इश्क़
में
सब
क़ुबूल
करते
हुए
मैंने
सोचा
न
भूल
करते
हुए
हँस
के
पूछी
है
ख़ैरियत
उसने
मन
के
काँटों
को
फूल
करते
हुए
इश्क़
ने
सब
तबाह
कर
डाला
इक
जवानी
को
धूल
करते
हुए
उम्र
का
कुछ
ख़याल
करना
था
काम
सारे
फ़ुज़ूल
करते
हुए
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Ankit gupta
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तुम्हारे
साथ
तो
अब
क़ाफ़िले
हैं
मगर
हम
आज
भी
तन्हा
खड़े
हैं
कभी
बाद-ए-सबास
पूछना
ये
तेरी
यादों
में
कितना
जागते
हैं
तुम्हारा
"आप"
कहना
खल
रहा
है
हमारे
बीच
कितने
फ़ासले
हैं?
कहीं
भी
दिल
नहीं
लगता
हमारा
तेरे
बारे
में
इतना
सोचते
हैं
तवक़्क़ो
ग़ैर
से
क्या?
जब
दुखों
में
हमारे
अपने
जुमले
कस
रहे
हैं
बचो
शीरीं
ज़बाँ
वालों
से
यारों
फँसाने
के
सभी
ये
चोचले
हैं
वहाँ
अब
जा
रहा
हूँ
यार
अंकित
जहाँ
कुछ
लोग
मुझको
जानते
हैं
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Ankit gupta
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साल
ये
भी
चला
गया
आख़िर
ये
बता
क्या
नया
हुआ
आख़िर
हमने
तक़दीर
को
ही
समझा
सब
और
सबकुछ
हुआ
बुरा
आख़िर
चार
दिन
में
बिछड़
गए
हम
तुम
जिसका
डर
था
वही
हुआ
आख़िर
वस्ल
की
रात
साथ
में
हमने
हिज्र
का
ज़हर
भी
पिया
आख़िर
पहले
तो
साथ
चलते
थे
दोनों
उसने
रस्ता
बदल
लिया
आख़िर
हमने
हरदम
उसे
मुहब्बत
दी
उसने
फिर
ग़म
दिया
नया
आख़िर
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Ankit gupta
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न
तोड़ो
फूल
ये
सूना
लगेगा
गुलिस्ताँ
की
इसी
से
रौनक़ें
हैं
Ankit gupta
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तुम्हारे
साथ
हर
रस्ता
हसीं
था
तुम्हारे
बाद
केवल
ठोकरें
हैं
Ankit gupta
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