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Amol
jal raha zakhm hain aur marham nahin
jal raha zakhm hain aur marham nahin | जल रहा ज़ख़्म हैं और मरहम नहीं
- Amol
जल
रहा
ज़ख़्म
हैं
और
मरहम
नहीं
बात
ये
भी
हैं
इस
बात
का
ग़म
नहीं
- Amol
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यूँँ
न
क़ातिल
को
जब
यक़ीं
आया
हम
ने
दिल
खोल
कर
दिखाई
चोट
Fani Badayuni
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पुरानी
चाहत
के
ज़ख़्म
अब
तक
भरे
नहीं
हैं
और
एक
लड़की
पड़ी
है
पीछे
बड़े
जतन
से
Ashu Mishra
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सुख़न
का
जोश
कम
होता
नहीं
है
वगरना
क्या
सितम
होता
नहीं
है
भले
तुम
काट
दो
बाज़ू
हमारे
क़लम
का
सर
क़लम
होता
नहीं
है
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Baghi Vikas
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जितने
भी
हैं
ज़ख़्म
तुम्हारे
सिल
देगी
होटल
में
खाने
का
आधा
बिल
देगी
सीधे
मुँह
जो
बात
नहीं
करती
है
जो
तुमको
लगता
है
वो
लड़की
दिल
देगी
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Shadab Asghar
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उम्र
के
आख़िरी
मक़ाम
में
हम
मिल
भी
जाए
तो
क्या
ख़ुशी
होगी
क्या
सितम
तुम
को
देखने
के
लिए
हम
को
दुनिया
भी
देखनी
होगी
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Vikram Sharma
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किनारे
दो
मिलाने
में
हैं
कितनी
मुश्किलें
सोचो
ये
पुल
दिन
भर
ही
सीने
पे
बिचारा
चोट
खाता
है
Prashant Beybaar
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ज़िन्दगी,
यूँँ
भी
गुज़ारी
जा
रही
है
जैसे,
कोई
जंग
हारी
जा
रही
है
जिस
जगह
पहले
से
ज़ख़्मों
के
निशां
थे
फिर
वहीं
पे
चोट
मारी
जा
रही
है
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Azm Shakri
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यूँँ
बे-तरतीब
ज़ख़्मों
ने
बताया
राज़
क़ातिल
का
सलीके
से
जो
मेरा
क़त्ल
गर
होता
तो
क्या
होता
Vikram Gaur Vairagi
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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शाख़-दर-शाख़
होती
है
ज़ख़्मी
जब
परिंदा
शिकार
होता
है
Indira Varma
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हवा
को
ख़रीद'ने
के
लाले
पडे
हैं
हमारे
कयामत
से
पाले
पड़े
हैं
Amol
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दिल
को
अभी
करार
है
ग़म
आजकल
फरार
है
कोई
भी
आता
जाता
है
दिल
में
कहीं
दरार
है
महँगी
बड़ी
है
कैफियत
सपने
पड़े
उधार
है
मेरी
जो
सिर्फ़
यार
थी
उस
को
मुझी
से
प्यार
है
पूछा
जो
हाल
उस
ने
है
कह
दो
कि
अब
सुधार
है
तस्वीर
थी
तिरी
जहाँ
अब
बस
वहाँ
दीवार
है
ये
ज़िन्दगी
है
बे
-
वफा
जीना
यहाँ
खुमार
है
कहते
तुझे
शराब
क्यूँँ
ये
लोग
सब
बिमार
है
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अब
हमें
इस
सफ़र
से
निकलना
हैं
कुछ
दिनों
बाद
घर
से
निकलना
हैं
हैं
नदामत
इलाही
,
रहम
बरसा
इस
ख़ुदा-ए-कहरस
निकलना
हैं
चूम
लूँ
हाथ
बे-
ख़ौफ़
उस
के
बस
ऐ
वबा
तेरे
डर
से
निकलना
हैं
रात
के
ख़्वाब
जो
याद
देती
हैं
बस
मुझे
उस
सहरस
निकलना
हैं
याद
कूचा
-ए-
जाँ
पाँव
को
आए
अब
मुझे
इस
शहरस
निकलना
हैं
तू
हैं
'दीदार'
,
वो
मुंतज़िर
फिर
भी
?
बद-अहद
इस
नजर
से
निकलना
हैं
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ग़मों
को
मिरे
जो
गिना
जा
रहा
हैं
कि
मशगूल
होके
सुना
जा
रहा
हैं
मिरी
हैं
ये
किस्मत
या
फिर
सजा
हैं
कि
क़ातिल
मुझी
से
चुना
जा
रहा
हैं
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लौटना
है
तो
मिरे
दर
तक
चले
आ
ये
मिलन
तक
का
सफ़र
मुझ
सेे
न
होगा
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