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Alankrat Srivastava
sur nahin kahii bhi aise koi bhi sitaar men
sur nahin kahii bhi aise koi bhi sitaar men | सुर नहीं कहीं भी ऐसे कोई भी सितार में
- Alankrat Srivastava
सुर
नहीं
कहीं
भी
ऐसे
कोई
भी
सितार
में
सुर
जो
बोली
में
है
तेरी
है
तेरी
पुकार
में
मंदिरों
में
मस्जिदों
में
बन
नहीं
सके
मगर
आदमी
बने
हैं
आदमी
पड़े
जो
प्यार
में
- Alankrat Srivastava
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उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी
से
अंजुम
सह
में
जाते
हैं
कि
ये
टूटा
हुआ
तारा
मह-ए-कामिल
न
बन
जाए
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Allama Iqbal
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आने
वाले
जाने
वाले
हर
ज़माने
के
लिए
आदमी
मज़दूर
है
राहें
बनाने
के
लिए
Hafeez Jalandhari
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मत
सहल
हमें
जानो
फिरता
है
फ़लक
बरसों
तब
ख़ाक
के
पर्दे
से
इंसान
निकलते
हैं
Meer Taqi Meer
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गिरजा
में
मंदिरों
में
अज़ानों
में
बट
गया
होते
ही
सुब्ह
आदमी
ख़ानों
में
बट
गया
Nida Fazli
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ढा
दे
जो
इंसान
के
दिल
में
रंग
ओ
नस्ल
की
दीवारें
कोई
तो
दस्तूर-ए-मोहब्बत
ऐसा
आलमगीर
लिखो
Iliyas ishqi
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इश्क़
जब
तक
न
कर
चुके
रुस्वा
आदमी
काम
का
नहीं
होता
Jigar Moradabadi
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देख
कर
इंसान
की
बेचारगी
शाम
से
पहले
परिंदे
सो
गए
Iffat Zarrin
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लोगों
ने
बहुत
चाहा
अपना
सा
बना
डालें
पर
हम
ने
कि
अपने
को
इंसान
बहुत
रक्खा
Abdul Hameed
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इत्तिफ़ाक़
अपनी
जगह
ख़ुश-क़िस्मती
अपनी
जगह
ख़ुद
बनाता
है
जहाँ
में
आदमी
अपनी
जगह
Anwar Shaoor
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तबक़ों
में
रंग-ओ-नस्ल
के
उलझा
के
रख
दिया
ये
ज़ुल्म
आदमी
ने
किया
आदमी
के
साथ
Bakhtiyar Ziya
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है
बड़ा
ही
ख़ौफ़
उनका
आम
सी
आवाम
पे
हम
नहीं
डरते
किसी
भी
शाह
के
ऐलान
से
है
बड़ी
बदनाम
सी
हम
शायरों
की
महफ़िलें
बात
की
है
मैकशी
की
वो
भी
पूरे
शान
से
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Alankrat Srivastava
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लिख
रहा
हूँ
अनोखी
ग़ज़ल
दोस्तों
यानी
उसके
बदन
का
बदल
दोस्तों
ज़िन्दगी
जिस
सहारे
मैं
जीता
गया
क्या
हक़ीक़त
में
थे
भी
वो
पल
दोस्तों
कर
तो
लेता
मुहब्बत
दुबारा
अगर
मिल
कहीं
जाती
उसकी
नक़ल
दोस्तों
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Alankrat Srivastava
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ये
ज़मीं
की
कसक
है
कि
उसने
सनम
बन
के
पर्वत
है
बादल
को
चूमा
हुआ
Alankrat Srivastava
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ख़ूब-सूरत
बहुत
पर
है
टूटा
हुआ
है
मेरे
दिल
की
हालत
भी
कश्मीर
सी
Alankrat Srivastava
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हारे
बैठे
हैं
क्यूँ
उसके
आगे
सभी
एक
कन्या
ही
है
वो
सिकंदर
नहीं
Alankrat Srivastava
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