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Alankrat Srivastava
bas zaraa der ko baag men bai
bas zaraa der ko baag men bai | बस ज़रा देर को बाग़ में बैठी वो
- Alankrat Srivastava
बस
ज़रा
देर
को
बाग़
में
बैठी
वो
पेड़
पौधे
भी
ग़ज़लें
सुनाने
लगे
फूल
भी
ख़ास
भाते
न
थे
हमको
पर
साथ
तुम
थी
तो
काँटें
सुहाने
लगे
- Alankrat Srivastava
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एक
जैसे
दिखने
वाले
सात
होते
हैं
मगर
उसके
जैसा
कोई
दूजा
भी
मुझे
दिखता
नहीं
Alankrat Srivastava
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बिन
तेरे
मेरा
घर
भी
लगे
घर
नहीं
ऐसा
मानो
की
पंछी
हो
पर,
पर
नहीं
जल
महल
हो
या
हो
आगरा
का
किला
तुम
सा
शीतल
नहीं
तुम
सा
सुंदर
नहीं
पार्थ
का
नाम
है
हर
गली
हर
नगर
पर
वो
नैनों
से
बेहतर
धनुर्धर
नहीं
रक्त
बहता
रहा
साँस
थमती
रही
झुक
गया
था
बदन
पर
झुका
सर
नहीं
क्यूँ
मेरी
बेवफ़ाई
पे
हैरान
हो?
मैं
कोई
देवता
या
पयंबर
नहीं
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Alankrat Srivastava
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कौन
कहता
है
ये
दूर
मुझ
सेे
हो
तुम
तुम
सेे
रौशन
हूँ
मैं
नूर
मुझ
सेे
हो
तुम
Alankrat Srivastava
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है
ग़ज़ल
मेरी
पर
है
तेरे
नाम
पर
ला
के
छोड़ा
मुझे
कैसे
अंजाम
पर
सर
झुकाया
न
था
जो
किसी
के
लिए
तेरे
ख़ातिर
झुके
अब
सभी
धाम
पर
लिख
रहा
था
ग़ज़ल
जो
तुम्हारे
लिए
कर
रही
थी
असर
सारी
आवाम
पर
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Alankrat Srivastava
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बड़ी
शिद्दत
से
जो
पुतला
सजाया
था
सभी
मिल
के
उसे
ही
अब
जलाएंगे
Alankrat Srivastava
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